देश में आम चुनाव उत्सव से कम नहीं होते। इनमें लोकतंत्र के
विधाता मतदाता को रिङााने के मंत्रों के रूप में नारे भी गढ़े जाते रहे हैं। लेकिन समय के साथ अब चुनाव भी हाई टेक हो चला है और ख_े-मीठे नारे गुम हो चले हैं। पोस्टर बैनर सहित दीवाल लेखन में अब पहले जैसी धारदार भाषा या नारे देखने को नहीं मिलते हैं। नारों के इतिहास पर यदि नजर डालें तो ज्यादातर प्रभावी नारे विपक्ष के मजबूत होने के साथ ही सामने आए हैं। जन संघ से लेकर भाजपा तक एक से बढ़कर एक नारे आए और जनता की जुबान पर चढ़े।
जनसंघ के जमाने से नारे आधारित लड़ाई की शुरुआत कही जा सकती है। उस समय जनसंघ विपक्ष की भूमिका निभा रहा था और उसने आम चुनाव में हर जोर जुर्म की टक्कर में जनसंघ आपका साथी है का नारा दिया था। इनका दूसरा नारा कांग्रेस के निशान बैल को लेकर था, जिसमें कहा गया कि बैल बैल चिल्लाते हैं और बैल की मां कटवाते हैं एवं बैल चलाकर
देख लिया अब दीप जलाकर देखेंगे। इन चुनाव में जनसंघ के चुनाव चिन्ह दीप को निशाना बनाते हुए कांग्रेस का नारा इस दीए में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं था। १९७१ के आम चुनाव में कांग्रेस की ओर से श्रीमती इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। यह नारा न सिर्फ लोकप्रिय हुआ बल्कि मतदाता ने कांग्रेस को स्वीकारते हुए सत्ता की बागडोर सौंपी। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ विपक्ष का यह नारा स्वर्ग से नेहरू करें पुकार मत कर बेटी अत्याचार जन-जन की जुबान पर था। विपक्षी दलों की सरकार बनने और समय पूरा किए बिना गिरने पर हुए आम चुनाव में कांग्रेस की ओर से स्थिर सरकार का नारा बुलंद किया गया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुए आम चुनाव में उन्होंने इक्कीसवीं सदी का भारत और मेरा भारत महान का नारा दिया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुए बोफोर्स कांड को भी चुनावी मुद्दा बनाते हुए नारे गढ़े गए। इसके साथ ही इन चुनाव में महंगाई को मुद्दा बनाते हुए विपक्षी पार्टियों ने दस की शक्कर चालीस का
तेल देखो राजीव सरकार का खेल जैसा नारा गढ़ा और यह कारगार रहा। चुनाव के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी जो विभिन्न ङांङाावातों के बीच दो वर्ष में ही धराशायी हो गई। इसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की ओर से स्थिर सरकार और भाजपा की ओर से भूख न भय न भ्रष्टाचार, हम देंगे अच्छी सरकार का नारा दिया गया। वर्ष १९९९ में देश में पहली बार
भाजपानीत गठबंधन की सरकार के चलने के बाद तत्कालीन सत्तासीन गठबंधन की ओर से भारत उदय का नारा दिया गया। इस चुनाव में कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा भी बुलंद हुआ। इनके बाद भी नारे
बुलंद होते रहे जिनमें नजर अटल पर, मुहर कमल पर प्रमुख रहे। यह नारे अखिल भारतीय स्तर पर पसंद किए गए।
मूंछ की कहां पूछ
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देशपालसिंह पंवार
नाक के नीचे जो ऑंधी आई थी, उसमें सिर्फ बाल ही बॉंका हुआ था, किसी और के
हताहत होने की कोई सूचना नहीं आई। 0-एक वो जमाना था जब मूंछें आन-...
11 वर्ष पहले
