मंगलवार, 2 जून 2009

कटोरे से गुम हो रही धान


धान जिसके नाम से छत्तीसगढ़ देश-दुनिया में पहचाना जाता है और प्रदेशवासियों का पेट भी धान से निकलने वाले चावल से ही भरता रहा है, लेकिन अब धान के कटोरे से ही धान धीरे-धीरे कम होने लगा है। २४ हजार प्रजातियों वाले प्रदेश में धान की बोनी का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। विडंबना है कि इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। जितने क्षेत्रफल में गत वर्ष खरीफ की फसल बोई गई थी, इस वर्ष का लक्ष्य उससे भी कम है, जबकि हर वर्ष लक्ष्य को बढ़ाकर निर्धारित किया जाता है। संचालनालय कृषि से प्राप्त जानकारी के अनुसार जारी खरीफ फसल में बोनी ४ हजार ७८४ हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोनी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह लक्ष्य गत वर्ष की कुल बोनी के लक्ष्य ४ हजार ७८१ हजार हेक्टेयर से तो ज्यादा है, लेकिन इसमें धान के लिए निर्धारित किया गया बोनी का रकबा गत वर्ष की अपेक्षा कम है। इस वर्ष धान के लिए ३ हजार ५३७ हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल रकबे में बोनी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जबकि गत वर्ष खरीफ के मौसम में ३ हजार ६१० हजार हेक्टेयर में धान की फसल लगाई गर्ई थी। जानकारी के अनुसार हर वर्ष लक्ष्य को दस फीसदी बढ़ाकर निर्धारित किया जाता है, लेकिन धान के मामले में ऐसा नजर नहीं आ रहा है। धान, मक्का जैसे पारंपरिक फसलों को छोड़कर अन्य का लक्ष्य निर्धारण बढ़ा कर तय किया गया है। अरहर, उड़द, सोयाबीन, तिल आदि का लक्ष्य गत वर्ष की पूर्ति के लक्ष्य से अधिक है। बस धान के साथ उपेक्षा होती नजर आ रही है। पिछले खरीफ मौसम में बोए गए कुल रकबे के मुकाबले इस वर्ष निर्धारित किया गया लक्ष्य ७३ हजार हेक्टेयर रकबा कम है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि अपने घर में ही धान को मान नहीं मिल रहा है। जबकि प्रदेश की एक महत्वपूर्ण पहचान धान के उत्पादन के कारण है। प्रदेश को धान का कटोरा कहा जाता रहा है जो धीरे-धीरे लगातार खाली होता जा रहा है। गुम हुई औषधीय धान
औषधीय धान की विभिन्न किस्मों का उत्पादन अब न के बराबर हो रहा है। जैव विविधता के लिए मशहूर रहे छत्तीसगढ़ में पारंपरिक चिकित्सा खूब फली-फूली है। यहां पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों के साथ ही देश दुनिया में पहचान दिलाने वाले चावल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता रहा है। प्रदेश में पाई जाने वाली धान की हजारों किस्मों में से कुछ ऐसी भी हैं जो विभिन्न प्रकार के रोगों में कारगर हैं। वैद्य इनका उपयोग मरीजों का इलाज करने में करते रहे हैं, लेकिन बदलते समय और ज्यादा कमाने की चाहत यहां भी भारी पड़ी और नई-नई किस्मों की बुआई के बीच औषधीय किस्में लगातार लुप्त होती चली गईं। किसानों को जानकारी न होने से वे लगातार इन किस्मों से दूर होते चले जा रहे हैं। प्रदेश में धान की गठुअन, भेजरी, आलवा, लाइचा, रेसारी, नागकेशर, काली मंूछ, महाराजी, बायसुर, निबार, धौर, करहनी, लुचई, क्षत्रिय आदि किस्मों का उपयोग औषधि के रूप में होता रहा है।