सोमवार, 11 मई 2009

बढता प्रदुषण क्षय का कारण

एक समय था जब टीबी या क्षयरोग को गांव या गंदी बस्तियों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, शहरी क्षेत्रों में भी क्षय रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है जिसका एक बड़ा कारण प्रदूषण है। स्वास्थ्य विभाग के उप संचालक दीनानाथ ने बताया कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में रोगियों की संख्या लगभग बराबर है। शहरी क्षेत्रों में रोग का मुख्य कारण धूल और बढ़ता प्रदूषण है जबकि गांवों में इसकी मूल वजह कुपोषण है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में क्षयरोगियों की संख्या में कमी आई है जो नियंत्रण के प्रशासनिक उपायों की सफलता कही जा सकती है। यदि लोग जागरुकता का परिचय दें तो इसमें और कमी आ सकती है। उन्होंने बताया कि अब स्थिति बेहतर हो रही है। वर्ष ०७ की अपेक्षा ०८ में क्षय रोगी कम हुए हैं। उन्होंने बताया कि क्षय रोग के नए मामलों में लगभग दो तिहाई की कमी आई है। श्री देवांगन के अनुसार लगभग ८४ प्रतिशत रोगी इलाज से ठीक हो रहे हैं।
पच्चीस फीसदी में पाए गए लक्षण
स्वास्थ्य संचालनालय से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करने पर स्थिति की भयावहता स्पष्ट हो जाती है। वर्ष २००८ में कुल एक लाख आठ हजार चार सौ उन्तालीस संदेहास्पद लोगों की जांच की गई थी जिसमें से लगभग पच्चीस फीसदी से अधिक सत्ताइस हजार दो सौ अठत्तर लोगों में क्षयरोग के लक्षण पाए गए। इनमें ग्यारह हजार दो सौ चालीस लोगों में संक्रामक टीबी के रोगी मिले। इसके पूर्व वर्ष २००७ में प्रदेश में कुल रोगियों की संख्या सत्ताइस हजार पांच सौ चार थी।
कैप्टन ऑफ डेथ से प्रतिदिन मरते एक हजार
विश्व क्षय दिवस डॉ. रॉबर्ट कोक्स के जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने इसके जीवाणु की खोज की थी। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसे मास्टर ऑफ डेथ या कैप्टन ऑफ डेथ भी कहा जाता है। आज तक विश्व में किसी रोग या प्राकृतिक आपदा या विश्व युद्ध ने इतनी जानें नहीं ली हैं, जितनी टीबी ने ली है। भारत में हर दिन पांच हजार लोगों को टीबी की बीमारी होती है और प्रतिदिन एक हजार लोग इससे मर जाते हैं।
उपचार बीच में छोडऩा खतरनाक
उप संचालक दीनानाथ देवांगन बताते हैं कि क्षयरोग हो जाने पर इसे पूर्णत: ठीक किया जा सकता है लेकिन उसके लिए आवश्यक है कि डाट्स के तय समय तक नियमित रूप से खाया जाए। लेकिन ऐसे प्रकरण अक्सर आते हैं कि क्षयरोगी द्वारा डाट्स खाना बीच में ही छोड़ दिया जाता है। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। क्योंकि ऐसा करने से रोगी के अंदर मौजूद क्षयरोग के जीवाणु डाट्स से लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं और रोगी को और डेढग़ुना ज्यादा समय तक दवा खानी पड़ती है। इसके अलावा इस प्रकार के रोगी के संपर्क में आने से जो नए रोगी पैदा होते हैं उनपर भी डाट्स का नियमित कोर्स असर नहीं करता है। क्षय रोग के अंतर्गत एमडीआर टीबी ऐसी परिस्थिति है, जिसमें टीबी की आम औषधियां काम नहीं करती हैं। वहीं अब तो इससे भी खतरनाक टीबी जिसे एक्सडीआर टीबी कहा जाता है, वह भी बढ़ रही है। इस तरह की टीबी में कोई दवा काम नहीं करती है। क्षयरोगियों को चाहिए कि वे डाट्स खाना बीच में न छोड़ें।

नशेब नही होते चार कंधे

आम आदमी की तमन्ना होती है कि शांति पूर्वक जीवन के बाद उसकी अंतिम यात्रा चार कंधो पर हो, लेकिन बढ़ती आपाधापी और संवेदन शून्य होते समाज में अब अंतिम यात्रा के लिए चार कंधे भी नसीब नहीं होते हैं। इस तरह के उदाहरण शहर में हर रोज देखने को मिल जाते हैं। अंतिम संस्कार में शामिल होने अब आवश्यक संख्या में लोग नहीं पहुंचते और शव चार कंधो के स्थान पर किराए की गाड़ी पर ले जाया जाता है।
शहर में देवेन््र नगर स्थित मुक्तिधाम, महादेव घाट व मारवाड़ी शमसान घाट सहित छोटे बड़े लगभग आधा दर्जन से शमसान घाट हैं। इनमें लगभग हर रोज अंतिम संस्कार होता है। जहां पहुंचने वाली शवयात्रा में बदलाव स्पष्ठ देखे जा सकते हैं। शमसान घाट पहुंचने वाली मृत देह अब चार कंधों पर नहीं बल्कि चार पहियों पर पहुंचती है। यह मृत व्यक्ति की अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं वरन मजबूरी वश होता है। क्योंकि मौत पर अब पड़ोसी भी नहीं पहुंचते,पुण्य का काम माने जाने वाले अंतिम संस्कार में नफा नुकसान को आंका जाने लगा है। मृतक कोई उद्योगपति, राजनेता या अन्य इसी प्रकार का बड़ा नाम होता है तो उनकी शवयात्रा में जाने वालों और उनके घर पहुंच कर मगरमच्छ के आंसू बहाने वालों की भीड़ लगी रहती है। आम आदमी हुआ तो उसके यहां पहुंचने वाले नजदीकी रिस्तेदार ही होते हैं। जिनके पास थोड़ी बहुत संवेदनां होती है वे भी गाडिय़ों से सीधे शमसान घाट पहुंचते हैं और वहां भी वे अपने धंधे की या अन्य तरह की बातों में मशगूल रहते हैं। राजधानी में शमसान घाट तक शव ले जाने वाली गाडिय़ों की संख्या लगातार इजाफा हो रहा है। इसके बावजूद मृतक के परिजनों के लिए अंतिम संस्कार के लिए कई घंटे तक इंतजार करना पड़ता है क्योंकि यह गाडिय़ां इतनी व्यस्त होती है कि उनके संचालकों को एक ही समय पर चार पांच स्थानों से एक साथ इन गाडिय़ों के बुलावे की सूचना आती है। जो इस बात का प्रमाण हैं कि चार कंधे मिलना भी अब बीती बात होने वाली है। इस संबंध में समाज सेवी अनिल गुरुवक्षाणी कहते हैं कि मौजूदा समय में सवेंदन शून्यता तो निश्चित बढ़ी है। आम आदमी के पास समय की कमी और दूर-दूर शमसान घाट होने के कारण लोग पैदल जाने की अपेक्षा गाड़ी से जाना पसंद करते हैं। यह जरूरी तो नहीं लेकिन आपाधापी की जिंदगी में कम पड़ते समय में आवश्यता सी बन गई है।
ह्यह्यशहर में शमसान घाट तक शव ले जाने वाले तीन वाहन हैं जिन्हें स्वर्ग रथ कहा जाता है। इनमें से एक मारवाड़ी युवा मंच के पास है जब कि दो बढ़ते कदम संस्था संचालित कर रही है। इनकी मांग दिन ब दिन बढ़़ रही है। कभी कभी तो एसा समय आता है जब एक ही समय में तीन चार स्थानों से एक साथ बुलावा आ जाता है। इसका बड़ा कारण लोगों के बीच बढ़ती दूरियां हैं। कभी कभी तो यह भी देखने को मिलता है कि शव गाड़ी के इंतजार में रखा रहता है जब तक गाड़ी नहीं पहुंचती तब तक अंतिम यात्रा नहीं निकल पाती है।
इं्रकुमार डोडवाणी(अध्यक्ष)
समाज सेवी संस्था बढ़ते कदम

गीता के आधार पर गढ़ रही जातियां

इसे समय की mang कहें या अर्थसत्ता का प्रभाव कि जातियों के बंधन टूट रहे हैं। इसके साथ ही व्यवसाय के पारम्परिक बंधन भी
शिथिल हो गए हैं। ब्राम्हण वर्ण में पैदा होने वाले व्यक्ति धार्मिक कर्मकाण्ड छोड़ अन्य कार्यों में संग्लग्र हो गए हैं, वहीं कल तक अछूत माने जाने वाले और कर्मकाण्ड से दूर रहने वाले वर्ण के लोग धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पन्न कराने लगे हैं। उनके मुख से निकलने वाले संस्कृत के श्लोक सुखद अहसास
कराते हैं। इस परिवर्तन में
श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित वर्ण व्यवस्था नए सिरे से बनती नजर आ रही है। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि 'चातुर्वण्य मया सृष्टं गुणकर्म
विभागश:ज् अर्थात चार वर्णों का निर्माण मुङा परमशक्ति के द्वारा गुण कर्म के आधार पर किया गया है। मौजूदा समय में इसी गुण कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था परमशक्ति का एक स्वरूप कुदरती आधार पर निर्मित हो रही है। कल तक विभिन्न समारोहों में बैण्ड बजाने का कार्य एक विशेष जाति करती थी, लेकिन अब इस कार्य में अन्य
जातियों के लोग भी मिल जाते हैं। ब्राम्हण के लिए आरक्षित माने जाने वाले धार्मिक कर्मकांड को अब अन्य जातियों के लोग भी सम्पन्न करा रहे हैं। सुरक्षा के लिए नियत क्षत्रिय वर्ण के लोग वैश्य का कृषि कार्य करते मिल जाते हैं। सुरक्षा सेनाओं में ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र आदि सभी वर्णों के लोग मिलते हैं। शिक्षा देने भी में सभी जाति के लोग संलग्र हो चुके हैं। इसी तरह कल तक बाल काटने का कार्य केवल नाइयों के भरोसे होता था, लेकिन अब सवर्ण भी इस कार्य में शामिल हो रहे हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण बालों के विशेषज्ञ जावेद हबीब द्वारा संंचालित वे विद्यालय हैं जिनमें बालों को सजाने संवारने का प्रशिक्षण लेने सभी वर्णों के युवक पहुंच रहे हैं। आकार लेती इस नई वर्ण व्यवस्था को इस आधार पर और बल मिलता है कि यह व्यवसायिक कार्य उनके शादी सम्बन्धो में भी महत्वपूर्ण
भूमिका निभाने लगे हैं। एक
चिकित्सक या उसके बेटे की शादी चिकित्सक के ही परिवार में किया जाना Ÿोयस्कर माना जाता है। सैनिक परिवार शादी सम्बन्ध करते समय सैनिक परिवार ही देखता है। इसी तरह किसान चाहे वह किसी भी जाति का हो वह विवाह सम्बन्ध करते वक्त किसान परिवार ही ढूंढ़ता है। इसका बड़ा कारण विचार मिलने और भविष्य में किसी
तरह का टकराव न होने की सोच के चलते होता है। मौजूदा समय में किसान, व्यवसायी, उद्योगपति आदि वर्गों में सभी वर्णों के लोग मिलते हैं। इस सम्बन्ध में समाज शाष्त्र के प्रोफेसर प्रमोद शर्मा कहते हैं कि वर्ण आधारित पारपम्परिक व्यवसाय अब नहीं बचे हैं। आर्थिक सत्ता के मजबूत होने से जिसे जो भा रहा है व्यवसाय कर रहा है।
वर्षों से जन्म आधारित व्यवस्था टूट कर कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था बन रही है।
भौतिकवादी युग की आवश्यकता
दर्शन शाष्त्र के प्रोफेसर डॉ. भगवंत सिंह कहते हैं कि अर्थव्यवस्था और
भौतिकवादी युग के चलते यह आवश्यक हो गया है कि जिसे जो अच्छा लगे, वह व्यवसाय करे। क्योंकि मौजूदा समय अर्थ प्रधान हो गया है। ऐसे में वर्ण आधारित व्यवसायिक परम्पराएं टूट रही हैं और नए सिरे से समाज का व्यवस्थापन हो रहा है। इसे गीता के आधार पर समाज का पुनर्गठन कहा जा सकता है लेकिन यह प्राथमिक अवस्था ही है, एक लम्बे समय बाद
संभव है कि कर्म के आधार पर बने वर्ण पूर्ण रूप से सामने आए। यह गीता में वर्णित गुण कर्म के आधार पर निर्मित वर्ण व्यवस्था का पुनस्र्थापन है।

गौ मूत्र बचाए बायपास सर्जरी से

जब किसी अपने को हृदय रोग होने की जानकारी होती है तो दिल बैठने लगता है, यदि आर्थिक स्थिति कमजोर हुई तो फिर भगवान से दुआ मांगने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता लेकिन चिंता करने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि देशी गाय के मूत्र पान करने और कुछ अन्य आयुर्वेदिक उपचार से हृदय की धमनियों में रक्त प्रवाह में पैदा हुए अवरोध दूर किए जा सकते हैं और बायपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस आयुर्वेदिक उपचार की सबसे बड़ी विशेषता यह कि इससे रोग से निवृत्ति हो जाती है और पुन: इलाज की
जरूरत नहीं पड़ती। जबकि बायपास सर्जरी में जीवन में भर दवाइयां खानी पड़ती हैं और पुन: सर्जरी भी करानी पड़ जाती है। आयुर्वेदिक इलाज का
लोहा मुंबई के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मनु कोठारी भी मानते हैं। यह इलाज उनके लिए संजीवनी सिद्ध हो सकता है जो रोग से पीडि़त हैं और आर्थिक या शारीरिक रूप से अक्षम हैं।
जानकारी के अनुसार आयुर्वेद में हृदय रोग से पीडि़त व्यक्ति के सीने पर एक
लेप लगाया जाता है साथ ही उसे कुछ पेय पिलाए जाते हैं इसके साथ ही उसे सुपाच्य भोजन दिया जाता है। लगभग पैंतालीस दिन तक चलने वाले इस आयुर्वेदिक उपचार के बाद रोगी निरोगी हो जाता है।
बीस मिलीग्राम गौ-मूत्र दूर करे हृदय की रुकावटें
आयुर्वेद में अधिकांश रोगों में प्रयुक्त होने वाला गौ मूत्र हृदय रोग को दूर करने में भी अहम भूमिका निभाता है। बछिया या देशी गाय का बीस मिली ग्राम गौ मूत्र सुबह शाम पीने से व इसके बाद सात तुलसी के पत्ते खाकर एक चम्मच शुद्ध शहद खाने से रक्त
पतला हो जाता है, जिससे रोग से निवृत्ति मिलती है।
आयुर्वेदिक लेप
इसमें काले उड़द की दाल रात में गौमूत्र से भिगोई जाती है सुबह उसे गुग्गल के साथ बारीक पीस कर अरंडी के तेल और देशी गाय के मक्खन में मिलाकर लेप बनाया जाता है। सुबह गाय के गोबर के लेप से हृदय स्थल में उबटन कर नहा लिया जाता है। नहाने के बाद बनाए गए लेप को हृदय से गले तक लगाकर सीधे लेट कर लगभग तीन घंटे तक आराम किया जाता है। उसके बाद अरंडी के पत्तों को चिकनी सतह की तरफ से लगाकर मुलायम कपड़े से बांध दिया जाता है। इसे चौबीस घंटे
तक बंधे रहने तक दूसरे रोज नहाते हैं। पुन: गोबर के उबटन से नहाते हुए पुन: लेप लगाते हैं, यह ४५ दिन तक प्रक्रिया दोहराई जाती है। इससे धमनियों में जमा अवरोध, नाडिय़ों की रुकावटें पिघल कर बाहर से ही दूर हो जाती हैं और रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है।
लेप लगाने के साथ ही हृदय रोगी को पेय दिया जाता है जिसमें छिलका सहित लौकी को घिस कर, तुलसी व पुदीना के दस-दस पत्ते मिलाकर पीस लिया जाता है और इसके रस को छानकर निकाल लिया जाता है। लगभग डेढ़ सौ ग्राम रस में इतना ही पानी मिलाकर भोजन के बाद और रात में सोने के पूर्व चार
काली मिर्च के चूर्ण तथा एक ग्राम सेंधा नमक के साथ पीते हैं। एक बार में लगभग ढाई सौ ग्राम की मात्रा पी जाती है। इसके पीने से पेट साफ हो जाता है और नुकसान दायी तत्व बाहर निकल जाते हैं एवं रक्त का संचरण सुचारु होने लगता है। इसके साथ ही अर्जुन छाल की चाय पीने और रोज दो पोथी लहसुन की चबाकर खाने से भी
लाभ होता है।
योग व प्राणायाम
आयुर्वेद में इलाज के साथ ही योग व प्राणायाम का सम्मिश्रण है। हृदय रोग के लिए सुखासन, पद्मासन व नाड़ी शोधन प्राणायाम लाभदायक हैं। इसमें भोजन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। हृदय रोगी के लिए अपच्य, गरिष्ठ, चिकनई युक्त
भोजन व सूखे मेवे वसा युक्त पदार्थ निषिद्ध हैं। इसके साथ ही आंवला और गाय के दूध से बनी ताजी छांछ के
अलावा अन्य किसी भी तरह की खटाई नहीं खाना चाहिए।
आयुर्वेद में हर तरह के रोगों का
इलाज है। इसमें हृदय रोग को दूर करने की भी विधियां हैं जिसमें योग प्राणयाम, खानपान व अन्य विधियों से हृदय की धमनियों में आई रुकावटों को दूर किया जाता है। इसमें कुछ समय
लगता है जिसके चलते रोगी बायपास सर्जरी के लिए भागता है जबकि आयुर्वेद का इलाज ज्यादा सस्ता और प्रभावी है।
डॉ.प्रदीप शुक्ला (प्रदेशाध्यक्ष)
आयुर्वेदिक चिकित्सक संघ