एक समय था जब टीबी या क्षयरोग को गांव या गंदी बस्तियों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, शहरी क्षेत्रों में भी क्षय रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है जिसका एक बड़ा कारण प्रदूषण है। स्वास्थ्य विभाग के उप संचालक दीनानाथ ने बताया कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में रोगियों की संख्या लगभग बराबर है। शहरी क्षेत्रों में रोग का मुख्य कारण धूल और बढ़ता प्रदूषण है जबकि गांवों में इसकी मूल वजह कुपोषण है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में क्षयरोगियों की संख्या में कमी आई है जो नियंत्रण के प्रशासनिक उपायों की सफलता कही जा सकती है। यदि लोग जागरुकता का परिचय दें तो इसमें और कमी आ सकती है। उन्होंने बताया कि अब स्थिति बेहतर हो रही है। वर्ष ०७ की अपेक्षा ०८ में क्षय रोगी कम हुए हैं। उन्होंने बताया कि क्षय रोग के नए मामलों में लगभग दो तिहाई की कमी आई है। श्री देवांगन के अनुसार लगभग ८४ प्रतिशत रोगी इलाज से ठीक हो रहे हैं।
पच्चीस फीसदी में पाए गए लक्षण
स्वास्थ्य संचालनालय से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करने पर स्थिति की भयावहता स्पष्ट हो जाती है। वर्ष २००८ में कुल एक लाख आठ हजार चार सौ उन्तालीस संदेहास्पद लोगों की जांच की गई थी जिसमें से लगभग पच्चीस फीसदी से अधिक सत्ताइस हजार दो सौ अठत्तर लोगों में क्षयरोग के लक्षण पाए गए। इनमें ग्यारह हजार दो सौ चालीस लोगों में संक्रामक टीबी के रोगी मिले। इसके पूर्व वर्ष २००७ में प्रदेश में कुल रोगियों की संख्या सत्ताइस हजार पांच सौ चार थी।
कैप्टन ऑफ डेथ से प्रतिदिन मरते एक हजार
विश्व क्षय दिवस डॉ. रॉबर्ट कोक्स के जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने इसके जीवाणु की खोज की थी। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसे मास्टर ऑफ डेथ या कैप्टन ऑफ डेथ भी कहा जाता है। आज तक विश्व में किसी रोग या प्राकृतिक आपदा या विश्व युद्ध ने इतनी जानें नहीं ली हैं, जितनी टीबी ने ली है। भारत में हर दिन पांच हजार लोगों को टीबी की बीमारी होती है और प्रतिदिन एक हजार लोग इससे मर जाते हैं।
उपचार बीच में छोडऩा खतरनाक
उप संचालक दीनानाथ देवांगन बताते हैं कि क्षयरोग हो जाने पर इसे पूर्णत: ठीक किया जा सकता है लेकिन उसके लिए आवश्यक है कि डाट्स के तय समय तक नियमित रूप से खाया जाए। लेकिन ऐसे प्रकरण अक्सर आते हैं कि क्षयरोगी द्वारा डाट्स खाना बीच में ही छोड़ दिया जाता है। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। क्योंकि ऐसा करने से रोगी के अंदर मौजूद क्षयरोग के जीवाणु डाट्स से लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं और रोगी को और डेढग़ुना ज्यादा समय तक दवा खानी पड़ती है। इसके अलावा इस प्रकार के रोगी के संपर्क में आने से जो नए रोगी पैदा होते हैं उनपर भी डाट्स का नियमित कोर्स असर नहीं करता है। क्षय रोग के अंतर्गत एमडीआर टीबी ऐसी परिस्थिति है, जिसमें टीबी की आम औषधियां काम नहीं करती हैं। वहीं अब तो इससे भी खतरनाक टीबी जिसे एक्सडीआर टीबी कहा जाता है, वह भी बढ़ रही है। इस तरह की टीबी में कोई दवा काम नहीं करती है। क्षयरोगियों को चाहिए कि वे डाट्स खाना बीच में न छोड़ें।
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