सोमवार, 11 मई 2009

गौ मूत्र बचाए बायपास सर्जरी से

जब किसी अपने को हृदय रोग होने की जानकारी होती है तो दिल बैठने लगता है, यदि आर्थिक स्थिति कमजोर हुई तो फिर भगवान से दुआ मांगने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता लेकिन चिंता करने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि देशी गाय के मूत्र पान करने और कुछ अन्य आयुर्वेदिक उपचार से हृदय की धमनियों में रक्त प्रवाह में पैदा हुए अवरोध दूर किए जा सकते हैं और बायपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस आयुर्वेदिक उपचार की सबसे बड़ी विशेषता यह कि इससे रोग से निवृत्ति हो जाती है और पुन: इलाज की
जरूरत नहीं पड़ती। जबकि बायपास सर्जरी में जीवन में भर दवाइयां खानी पड़ती हैं और पुन: सर्जरी भी करानी पड़ जाती है। आयुर्वेदिक इलाज का
लोहा मुंबई के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मनु कोठारी भी मानते हैं। यह इलाज उनके लिए संजीवनी सिद्ध हो सकता है जो रोग से पीडि़त हैं और आर्थिक या शारीरिक रूप से अक्षम हैं।
जानकारी के अनुसार आयुर्वेद में हृदय रोग से पीडि़त व्यक्ति के सीने पर एक
लेप लगाया जाता है साथ ही उसे कुछ पेय पिलाए जाते हैं इसके साथ ही उसे सुपाच्य भोजन दिया जाता है। लगभग पैंतालीस दिन तक चलने वाले इस आयुर्वेदिक उपचार के बाद रोगी निरोगी हो जाता है।
बीस मिलीग्राम गौ-मूत्र दूर करे हृदय की रुकावटें
आयुर्वेद में अधिकांश रोगों में प्रयुक्त होने वाला गौ मूत्र हृदय रोग को दूर करने में भी अहम भूमिका निभाता है। बछिया या देशी गाय का बीस मिली ग्राम गौ मूत्र सुबह शाम पीने से व इसके बाद सात तुलसी के पत्ते खाकर एक चम्मच शुद्ध शहद खाने से रक्त
पतला हो जाता है, जिससे रोग से निवृत्ति मिलती है।
आयुर्वेदिक लेप
इसमें काले उड़द की दाल रात में गौमूत्र से भिगोई जाती है सुबह उसे गुग्गल के साथ बारीक पीस कर अरंडी के तेल और देशी गाय के मक्खन में मिलाकर लेप बनाया जाता है। सुबह गाय के गोबर के लेप से हृदय स्थल में उबटन कर नहा लिया जाता है। नहाने के बाद बनाए गए लेप को हृदय से गले तक लगाकर सीधे लेट कर लगभग तीन घंटे तक आराम किया जाता है। उसके बाद अरंडी के पत्तों को चिकनी सतह की तरफ से लगाकर मुलायम कपड़े से बांध दिया जाता है। इसे चौबीस घंटे
तक बंधे रहने तक दूसरे रोज नहाते हैं। पुन: गोबर के उबटन से नहाते हुए पुन: लेप लगाते हैं, यह ४५ दिन तक प्रक्रिया दोहराई जाती है। इससे धमनियों में जमा अवरोध, नाडिय़ों की रुकावटें पिघल कर बाहर से ही दूर हो जाती हैं और रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है।
लेप लगाने के साथ ही हृदय रोगी को पेय दिया जाता है जिसमें छिलका सहित लौकी को घिस कर, तुलसी व पुदीना के दस-दस पत्ते मिलाकर पीस लिया जाता है और इसके रस को छानकर निकाल लिया जाता है। लगभग डेढ़ सौ ग्राम रस में इतना ही पानी मिलाकर भोजन के बाद और रात में सोने के पूर्व चार
काली मिर्च के चूर्ण तथा एक ग्राम सेंधा नमक के साथ पीते हैं। एक बार में लगभग ढाई सौ ग्राम की मात्रा पी जाती है। इसके पीने से पेट साफ हो जाता है और नुकसान दायी तत्व बाहर निकल जाते हैं एवं रक्त का संचरण सुचारु होने लगता है। इसके साथ ही अर्जुन छाल की चाय पीने और रोज दो पोथी लहसुन की चबाकर खाने से भी
लाभ होता है।
योग व प्राणायाम
आयुर्वेद में इलाज के साथ ही योग व प्राणायाम का सम्मिश्रण है। हृदय रोग के लिए सुखासन, पद्मासन व नाड़ी शोधन प्राणायाम लाभदायक हैं। इसमें भोजन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। हृदय रोगी के लिए अपच्य, गरिष्ठ, चिकनई युक्त
भोजन व सूखे मेवे वसा युक्त पदार्थ निषिद्ध हैं। इसके साथ ही आंवला और गाय के दूध से बनी ताजी छांछ के
अलावा अन्य किसी भी तरह की खटाई नहीं खाना चाहिए।
आयुर्वेद में हर तरह के रोगों का
इलाज है। इसमें हृदय रोग को दूर करने की भी विधियां हैं जिसमें योग प्राणयाम, खानपान व अन्य विधियों से हृदय की धमनियों में आई रुकावटों को दूर किया जाता है। इसमें कुछ समय
लगता है जिसके चलते रोगी बायपास सर्जरी के लिए भागता है जबकि आयुर्वेद का इलाज ज्यादा सस्ता और प्रभावी है।
डॉ.प्रदीप शुक्ला (प्रदेशाध्यक्ष)
आयुर्वेदिक चिकित्सक संघ

1 टिप्पणी:

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