शनिवार, 6 जून 2009

दाने दाने के लिए हो जायंगे मोहताज


खत्म हो रहीं प्राकृतिक अन्नपूर्णाएं

आने वाला समय भुखमरी का दौर होगा। देश दुनिया को सत्तासी फीसदी भोजन देने वालीं अन्नपूर्णाएं तितलियां व मधुमक्खियां लगातार खत्म होती जा रहीं हैं। वर्ष दर वर्ष बढ़ता ताप, हवा व पानी में घुलता उद्योगों से निकलने वाला जहर, व फसलों पर डाले जाने वाले कीटनाशक इन नन्हें लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण जीवों पर भारी पड़ रहे हैं। इनकी संख्या आधी से भी कम रह गई है। हर दूसरे उंचे पेड़ पर बड़ी संख्या में लगने वाले मधुमक्यिों के छत्ते और घर से लेकर खेतों तक मंडराने वाली तितलियां प्राय: कम ही नजर आते हैं। न तो ऊंचे पेड़ बचे हैं और न ही वह मौसम रह गया है जिसमें तितलियां मंडरा सकें। शोधों के मुतबिक देश में पाई जाने वाली कुल मधुमक्यिों व तितलियों में से अब मात्र ४३ फीसदी ही बची हैं। छत्तीसगढ़ कुछ खुश किस्मत है कि यहां देश के औसत से कुछ बेहतर स्थिति है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक पुरस्कार प्राप्त माईक पांडे के अनुसार स्थिति बेहद चिंताजनक है, यदि अब भी शांत बैठे रहे तो भूखों मरने का समय ज्यादा दूर नहीं हैं। उन्होंने बताया कि पहले दुनिया में दो से तीन वर्षों का खाद्दान्न उपलब्ध रहता था लेकिन अब मात्र नब्बे दिनों का खाद्दान है यदि किसी वर्ष अनाज उत्पादन के प्रमुख देशों में अकाल की स्थिति बनी तो खाने के लाले पड़ जाएंगे। श्री पांडे के अनुसार फसलों में बीज व फल आने केे लिए तितलियां व मधुमक्खिां बेहद जरूरी हैं। तितलियां, मधुमक्खिां ८७ फीसदी व चिडिय़ां १३ फीसदी परागण करतीं है तभी अनाज पैदा होता है। यदि यह खत्म हो जाएंगी तो अनाज व फलों का उत्पादन स्वत: समाप्त हो जाएगा। इनके बिना सहयोग के परागण संभव नहीं है और बिना परागण के फसलों में बीज पड़ ही नहीं सकते हैं।

अर्थ मैटर्स के छत्तीसगढ़ प्रभारी व पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार ईको वरियस ०८ से पुरस्कृत कोमल पारिख के अनुसार चीन में मधुमक्खियों के लगातार खत्म होने से आपातकाल की स्थिति है। पेड़ों में फल व फसलों में बीज नहीं आ रहे है। किसान पेड़ों पर चढ़कर मुर्गियों के पंखों से फूलों को हिलाते हैं जिससे परागण हो सके और फल आ सकें। केलीफोर्निया में स्थित ६०० वर्ग किलोमीटर के फार्म में लगे बादाम के पेड़ों में फल नहीं आ रहे हैं। इसी तरह हमारे यहां भी फसलों व पेड़ों में फलन लगातार कमी दर्ज की जा रही है। इन सबका एक मात्र कारण मधुमक्खियों व तित्लियों का कम या खत्म हो जाना है। ताप बढऩे से होता तनावप्राणि विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अशोक पांडे के अनुसार तितली और मधुमक्खी के लिए अनुकूल तापमान २५ से २७ अंश सेंटीग्रेट होता है। ज्यादा और कम होने पर उन्हें तनाव होता है। जिससे उनका जीवन चक्र प्रभावित होता है। उनका जीवन, प्रजनन आदि सबकुछ प्रभावित होता है। प्रदूषण, बढ़ता तापक्रम आदि इन्हें प्राण घातक साबित होता है।

मंगलवार, 2 जून 2009

कटोरे से गुम हो रही धान


धान जिसके नाम से छत्तीसगढ़ देश-दुनिया में पहचाना जाता है और प्रदेशवासियों का पेट भी धान से निकलने वाले चावल से ही भरता रहा है, लेकिन अब धान के कटोरे से ही धान धीरे-धीरे कम होने लगा है। २४ हजार प्रजातियों वाले प्रदेश में धान की बोनी का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। विडंबना है कि इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। जितने क्षेत्रफल में गत वर्ष खरीफ की फसल बोई गई थी, इस वर्ष का लक्ष्य उससे भी कम है, जबकि हर वर्ष लक्ष्य को बढ़ाकर निर्धारित किया जाता है। संचालनालय कृषि से प्राप्त जानकारी के अनुसार जारी खरीफ फसल में बोनी ४ हजार ७८४ हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोनी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह लक्ष्य गत वर्ष की कुल बोनी के लक्ष्य ४ हजार ७८१ हजार हेक्टेयर से तो ज्यादा है, लेकिन इसमें धान के लिए निर्धारित किया गया बोनी का रकबा गत वर्ष की अपेक्षा कम है। इस वर्ष धान के लिए ३ हजार ५३७ हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल रकबे में बोनी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जबकि गत वर्ष खरीफ के मौसम में ३ हजार ६१० हजार हेक्टेयर में धान की फसल लगाई गर्ई थी। जानकारी के अनुसार हर वर्ष लक्ष्य को दस फीसदी बढ़ाकर निर्धारित किया जाता है, लेकिन धान के मामले में ऐसा नजर नहीं आ रहा है। धान, मक्का जैसे पारंपरिक फसलों को छोड़कर अन्य का लक्ष्य निर्धारण बढ़ा कर तय किया गया है। अरहर, उड़द, सोयाबीन, तिल आदि का लक्ष्य गत वर्ष की पूर्ति के लक्ष्य से अधिक है। बस धान के साथ उपेक्षा होती नजर आ रही है। पिछले खरीफ मौसम में बोए गए कुल रकबे के मुकाबले इस वर्ष निर्धारित किया गया लक्ष्य ७३ हजार हेक्टेयर रकबा कम है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि अपने घर में ही धान को मान नहीं मिल रहा है। जबकि प्रदेश की एक महत्वपूर्ण पहचान धान के उत्पादन के कारण है। प्रदेश को धान का कटोरा कहा जाता रहा है जो धीरे-धीरे लगातार खाली होता जा रहा है। गुम हुई औषधीय धान
औषधीय धान की विभिन्न किस्मों का उत्पादन अब न के बराबर हो रहा है। जैव विविधता के लिए मशहूर रहे छत्तीसगढ़ में पारंपरिक चिकित्सा खूब फली-फूली है। यहां पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों के साथ ही देश दुनिया में पहचान दिलाने वाले चावल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता रहा है। प्रदेश में पाई जाने वाली धान की हजारों किस्मों में से कुछ ऐसी भी हैं जो विभिन्न प्रकार के रोगों में कारगर हैं। वैद्य इनका उपयोग मरीजों का इलाज करने में करते रहे हैं, लेकिन बदलते समय और ज्यादा कमाने की चाहत यहां भी भारी पड़ी और नई-नई किस्मों की बुआई के बीच औषधीय किस्में लगातार लुप्त होती चली गईं। किसानों को जानकारी न होने से वे लगातार इन किस्मों से दूर होते चले जा रहे हैं। प्रदेश में धान की गठुअन, भेजरी, आलवा, लाइचा, रेसारी, नागकेशर, काली मंूछ, महाराजी, बायसुर, निबार, धौर, करहनी, लुचई, क्षत्रिय आदि किस्मों का उपयोग औषधि के रूप में होता रहा है।

बुधवार, 27 मई 2009

गेरू करती थी खाद्यान की सुरक्षा

आधुनिक समय में तरह-तरह के कीटनाशक बाजार में आकर बेअसर साबित हो रहे हैं। अनाज तो नहीं बच रहे उलट किसान इन महंगे कीटनाशकों से लुटने पर मजबूर हैं। लेकिन ईशा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी शातवाहन काल में किसानों के पास बेहद प्रभावी और आसानी से उपलब्ध कीटनाशक गेरु था जिससे वे अपने अनाज की सुरक्षा करते थे। ऐसे प्रमाण सिरपुर की खुदाई में मिले हैं। यहां मिले अनाज भंडारों में गेरु के टुकड़े पाए गए हैं।
सिरपुर में पुरातात्विक सलाहकार अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में चल रही खुदाई हर दूसरे रोज जमीन में दफन नए नए राज उगल रही है जिनसे उसकाल की समृद्ध सभ्यता और संस्कृति की जानकारी तो मिलती ही है। साथ ही उस समय की कृषि और उससे संबधित अन्य राज भी सामने आ रहे हैं जो आज भी कारगर हो सकते हैं। हाल ही में यहां आयुर्वेदिक कुंड, अनाज भंडार व वैदिक पाठशाला के अवशेष मिले हैं। इनमें से आयुर्वेदिक कुंड व अनाज भंडार शतवाहन काल ईसा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी के हैं जबकि वैदिक पाठशाला शरभपूर्या काल पांचवी-छटवीं शताब्दी की हैं। खुदाई के दौरान नगर संरचना में पत्थर से बने लंबे भूमिगत कमरों के अवशेष मिले हैं। इन्हें ढंकने की भी पुख्ता व्यवस्था की गई है। यह कमरे उस काल के अनाज भंडार माने जा रहे हैं। कमरों में गेरु के टुकड़े भी हैं जो उस काल में अनाज की सुरक्षा के उपायो की ओर इशारा करते हैं। आयुर्वेदिक कुंड के पास होने और इनके पत्थरों से बने होने के कारण इनमें चूहे तो पहुंचते ही न होंगे,अनाज को दीमक , घुन या अन्य इसी तरह के अन्य कीटों से सुरक्षा के लिए इनमें गेरु डाली जाती थी। गेरु के टुकड़े भूमिगत कमरों से प्राप्त हुए हैं।
आयुर्वेदिक कुंड में मिटते थे चर्मरोग
खुदाई में नगर सरंचना के तहत ३.६० मीटर के पत्थर कुंड मिले हैं। कुंड के पास ही तुलसीचौरा है। जिसका पानी एक भूमिगत नाली के माध्यम से कुंड में जाने की व्यवस्था है। साथ ही कुंड से एक भूमिगत नाली जल निकासी है। इनकी संरचना बताती है कि इन कुंडो के पानी का उपयोग विभिन्न चर्मरोंगों को ठीक करने के लिए किया जाता रहा होगा। इसमें तुलसीचौरा में लगी तुलसी को जल अर्पित करने पर पानी पत्तियों, शाखाओं और जड़ों से होकर कुंड में पहुंचता होगा। जो चर्मरोंगों को ठीक करने में कारगर होता है। संभवना है कि इसमें कुछ अन्य पत्तियां जैंसे नीम आदि को डाला जाता रहा होगा। इसे विभिन्न तरह के आयुर्वेदिक लेपों से होने वाली चिकित्सा से जोड़कर देखा जा रहा है।
तालाबों के बीच होती रही पढ़ाई
शरभपूर्या काल में सिरपुर के छात्र आठ तालाबों के बीच बनी वैदिक पाठशाला में वेदों का अध्यन करते थे। यहां रामकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर डेढ़ मीटर चौडें व दस मीटर लंबे बरामदे मिले हैं। इनके बीचों बीच स्थापित भगवान श्री विष्णु की १.१० मीटर की प्रतिमा इसके पाठशाला होने की ओर संकेत करती है। माना जाता है कि इस काल में वेदों के विरुद्ध मूर्तिपूजा चरम पर थी और पाठशालाओं में मूर्ति स्थापित कर उनके समक्ष ही विद्याअध्यन किया जाता था। पाठशाला रायकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर है। इसके पास ही आचार्यों के कमरे हैं। चारों ओर आठ तालाब हैं जिनमें आज भी कमल खिलते हैं।
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सिरपुर उत्खनन में नगर संरचना के बीच सार्वजनिक मकान में पत्थर के कुंड, निजी मकान में भूमिगत कमरे व रायकेरा तालाब के पूर्व में बरामदे मिले हैं। जिनमें से सार्वजनिक मकान में मिला कुंड आयुर्वेदिक कुंड की तरह है। यहां प्राप्त अनाज भंडार में गेरु के टुकड़े उस काल में कीटों से अनाज की सुरक्षा के उपायों को बताते हैं। साथ ही बरामदे की लंबाई चौड़ाई और उसके बीचों बीच स्थापित विष्णु की प्रतिमा शरभपूर्या काल की वैदिक पाठशाला की ओर इशारा करती है।
अरुण कुमार शर्मा
पुरातात्विक सलाहकार मानक
निदेशक सिरपुर खुदाई छत्तीसगढ़ शासन

रविवार, 24 मई 2009

केवल आयुर्वेद में स्वाइन- फ्लू का इलाज

मेक्सिको से शुरू हुआ स्वाइन फ्लू नामक जानलेवा रोग से अमरीका सहित करीब डेढ दर्जन देशों की सरकारों को चिंता में डाल दिया है। एलोपैथी में इस रोग पर काबू पाने कोई कारगर दवा नहीं है। वैसे तो गरम प्रदेश होने के कारण स्वाईन फ्लू के फैलने की संभावना लगभग न के बराबर है। लेकिन फिर प्रदेश से बाहर विशेषकर ठंडे प्रदेशों की ओर जाने वाले और हवाई यात्रा करने वालों में इसके संक्रमण का खतरा है और यदि स्वाईन फ्लू के रोगाणु किसी के साथ आ गए तो फैलने में देरी नहीं लगेगी। लेकिन चिंता करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि हमारे आयुर्वेद में स्वाईन फ्लू से लडऩे की ताकत है आमतौर पर गरम मसाला में उपयोग किया जाने वाला वदान्या फूल इस रोग पर असरकारक है। यह फूल मुख्यत: उत्तर पूर्व चीन का पौधा है। इसका अंगे्रजी नाम स्टार एनाइस है तथा इसका वनस्पतिक नाम इलीसियम बेरम है।
एच१ एन१ वीषाणु द्वारा फैलाया गया रोग स्वाइन फ्लू छूत का रोग है। अब तक स्वाईन फ्लू में कारगर एक मात्र दवा टामी फ्लू नामक दवा एच१ एन१ वायरस पर काबू पाने में कारगर है और यह दवा वदान्या फूल यानी स्टार एनाइस से बनती है। भारत में वदान्या फूल गरम मसाले में उपयोग होता है। यह भारत, अमेरिका और चीन में मिलता है। इस फूल का आकार सितारे जैसा होता है इसलिए इसे स्टार एनाइस कहते हैं। गरम मसालों में उपयोग होने की वजह से चीन के स्वास्थ्य मंत्री ने देश की जनता को सलाह दी है कि वे भोजन में स्टार एनाइस का इस्तेमाल करें।
आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार स्वाइन फ्लू से बचने के लिए लिए रोजाना मुलहठी, सौंफ, आइजवान, मुनक्का, अंजीर, उन्नाव, अरुष के पत्ते, जूफा, खूबकला, हंसराज, गुलबनस्पा तथा काली मिर्च सभी को बराबर मात्रा में लेकर भूसे की तरह कूचकर इसकी बीस ग्राम मात्रा को ढाई सौ मिली पानी में पकाकर व छानकर पांच ग्राम शक्कर मिलाकर सुबह शाम लेने से इस बीमारी से बचाव संभव है। चूंकि यह बीमारी सुअर के जीन में पाया जाता है, इसलिए सुअर का मांस खाने से पहले उसे अच्छी तरह से पकाना आवश्यक है।

आयुर्वेद में है स्वास्थ वृत्त
आयुर्वेद के प्रोफेसर संजय शुक्ला बताते हैं कि आयुर्वेद में स्वास्थ वृत्त है जिसके अनुसार बाहर से आने पर वहां का अन्न सहित कपड़े आदि को वहीं छोड़ आना चाहिए यदि ऐसा होता है तो संक्रमण वाले रोंगो की संभावना स्वत: ही समाप्त हो जाती है। इसके अलावा वादान्या फूल में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और संक्रमण से बचाव करने की क्षमता है जिससे वादन्या फूल को खाकर स्वाइन फ्लू के संक्रमण से बचा जा सकता है।

गुरुवार, 21 मई 2009

हाई टेक प्रचार मे गम हुए मीठे नारे

देश में आम चुनाव उत्सव से कम नहीं होते। इनमें लोकतंत्र के
विधाता मतदाता को रिङााने के मंत्रों के रूप में नारे भी गढ़े जाते रहे हैं। लेकिन समय के साथ अब चुनाव भी हाई टेक हो चला है और ख_े-मीठे नारे गुम हो चले हैं। पोस्टर बैनर सहित दीवाल लेखन में अब पहले जैसी धारदार भाषा या नारे देखने को नहीं मिलते हैं। नारों के इतिहास पर यदि नजर डालें तो ज्यादातर प्रभावी नारे विपक्ष के मजबूत होने के साथ ही सामने आए हैं। जन संघ से लेकर भाजपा तक एक से बढ़कर एक नारे आए और जनता की जुबान पर चढ़े।
जनसंघ के जमाने से नारे आधारित लड़ाई की शुरुआत कही जा सकती है। उस समय जनसंघ विपक्ष की भूमिका निभा रहा था और उसने आम चुनाव में हर जोर जुर्म की टक्कर में जनसंघ आपका साथी है का नारा दिया था। इनका दूसरा नारा कांग्रेस के निशान बैल को लेकर था, जिसमें कहा गया कि बैल बैल चिल्लाते हैं और बैल की मां कटवाते हैं एवं बैल चलाकर
देख लिया अब दीप जलाकर देखेंगे। इन चुनाव में जनसंघ के चुनाव चिन्ह दीप को निशाना बनाते हुए कांग्रेस का नारा इस दीए में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं था। १९७१ के आम चुनाव में कांग्रेस की ओर से श्रीमती इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। यह नारा न सिर्फ लोकप्रिय हुआ बल्कि मतदाता ने कांग्रेस को स्वीकारते हुए सत्ता की बागडोर सौंपी। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ विपक्ष का यह नारा स्वर्ग से नेहरू करें पुकार मत कर बेटी अत्याचार जन-जन की जुबान पर था। विपक्षी दलों की सरकार बनने और समय पूरा किए बिना गिरने पर हुए आम चुनाव में कांग्रेस की ओर से स्थिर सरकार का नारा बुलंद किया गया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुए आम चुनाव में उन्होंने इक्कीसवीं सदी का भारत और मेरा भारत महान का नारा दिया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुए बोफोर्स कांड को भी चुनावी मुद्दा बनाते हुए नारे गढ़े गए। इसके साथ ही इन चुनाव में महंगाई को मुद्दा बनाते हुए विपक्षी पार्टियों ने दस की शक्कर चालीस का
तेल देखो राजीव सरकार का खेल जैसा नारा गढ़ा और यह कारगार रहा। चुनाव के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी जो विभिन्न ङांङाावातों के बीच दो वर्ष में ही धराशायी हो गई। इसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की ओर से स्थिर सरकार और भाजपा की ओर से भूख न भय न भ्रष्टाचार, हम देंगे अच्छी सरकार का नारा दिया गया। वर्ष १९९९ में देश में पहली बार
भाजपानीत गठबंधन की सरकार के चलने के बाद तत्कालीन सत्तासीन गठबंधन की ओर से भारत उदय का नारा दिया गया। इस चुनाव में कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा भी बुलंद हुआ। इनके बाद भी नारे
बुलंद होते रहे जिनमें नजर अटल पर, मुहर कमल पर प्रमुख रहे। यह नारे अखिल भारतीय स्तर पर पसंद किए गए।

बढ़ता प्रदुषण क्षय का कारण

एक समय था जब टीबी या क्षयरोग को गांव या गंदी बस्तियों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, शहरी क्षेत्रों में भी क्षय रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है जिसका एक बड़ा कारण प्रदूषण है। स्वास्थ्य विभाग के उप संचालक दीनानाथ ने बताया कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में रोगियों की संख्या लगभग बराबर है। शहरी क्षेत्रों में रोग का मुख्य कारण धूल और बढ़ता प्रदूषण है जबकि गांवों में इसकी मूल वजह कुपोषण है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में क्षयरोगियों की संख्या में कमी आई है जो नियंत्रण के प्रशासनिक उपायों की सफलता कही जा सकती है। यदि लोग जागरुकता का परिचय दें तो इसमें और कमी आ सकती है। उन्होंने बताया कि अब स्थिति बेहतर हो रही है। वर्ष ०७ की अपेक्षा ०८ में क्षय रोगी कम हुए हैं। उन्होंने बताया कि क्षय रोग के नए मामलों में लगभग दो तिहाई की कमी आई है। श्री देवांगन के अनुसार लगभग ८४ प्रतिशत रोगी इलाज से ठीक हो रहे हैं।
पच्चीस फीसदी में पाए गए लक्षण
स्वास्थ्य संचालनालय से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करने पर स्थिति की भयावहता स्पष्ट हो जाती है। वर्ष २००८ में कुल एक लाख आठ हजार चार सौ उन्तालीस संदेहास्पद लोगों की जांच की गई थी जिसमें से लगभग पच्चीस फीसदी से अधिक सत्ताइस हजार दो सौ अठत्तर लोगों में क्षयरोग के लक्षण पाए गए। इनमें ग्यारह हजार दो सौ चालीस लोगों में संक्रामक टीबी के रोगी मिले। इसके पूर्व वर्ष २००७ में प्रदेश में कुल रोगियों की संख्या सत्ताइस हजार पांच सौ चार थी।
कैप्टन ऑफ डेथ से प्रतिदिन मरते एक हजार
विश्व क्षय दिवस डॉ. रॉबर्ट कोक्स के जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने इसके जीवाणु की खोज की थी। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसे मास्टर ऑफ डेथ या कैप्टन ऑफ डेथ भी कहा जाता है। आज तक विश्व में किसी रोग या प्राकृतिक आपदा या विश्व युद्ध ने इतनी जानें नहीं ली हैं, जितनी टीबी ने ली है। भारत में हर दिन पांच हजार लोगों को टीबी की बीमारी होती है और प्रतिदिन एक हजार लोग इससे मर जाते हैं।
उपचार बीच में छोडऩा खतरनाक
उप संचालक दीनानाथ देवांगन बताते हैं कि क्षयरोग हो जाने पर इसे पूर्णत: ठीक किया जा सकता है लेकिन उसके लिए आवश्यक है कि डाट्स के तय समय तक नियमित रूप से खाया जाए। लेकिन ऐसे प्रकरण अक्सर आते हैं कि क्षयरोगी द्वारा डाट्स खाना बीच में ही छोड़ दिया जाता है। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। क्योंकि ऐसा करने से रोगी के अंदर मौजूद क्षयरोग के जीवाणु डाट्स से लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं और रोगी को और डेढग़ुना ज्यादा समय तक दवा खानी पड़ती है। इसके अलावा इस प्रकार के रोगी के संपर्क में आने से जो नए रोगी पैदा होते हैं उनपर भी डाट्स का नियमित कोर्स असर नहीं करता है। क्षय रोग के अंतर्गत एमडीआर टीबी ऐसी परिस्थिति है, जिसमें टीबी की आम औषधियां काम नहीं करती हैं। वहीं अब तो इससे भी खतरनाक टीबी जिसे एक्सडीआर टीबी कहा जाता है, वह भी बढ़ रही है। इस तरह की टीबी में कोई दवा काम नहीं करती है। क्षयरोगियों को चाहिए कि वे डाट्स खाना बीच में न छोड़ें।

मंगलवार, 19 मई 2009

महिलाओं की हुई जय

00 दस फीसदी सीटें जीत कर रचा इतिहास
00देश भर से 59 महिलाएं पहुंची संसद


पंद्रहवीं लोकसभा महिलाओं के लिए शुभ रही है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार महिलाओं ने अपने राजनैतिक कौशल को दिखाते हुए दस फीसदी सीटें जीत कर इतिहास रच दिया है। महिला उम्मीदवारों ने 59 सीटों पर जीत दर्ज की है। देश के अब तक के संसदीय इतिहास में किसी भी लोकसभा चुनाव में महिला सांसदों की संख्या पचास तक भी नहीं पहुंच पाई थी।
2004 के लोक सभा चुनाव में 355 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था जिनमें से मात्र 45 महिलाएं ही संसद की सीढ़ी चढ़ पाईं थी। उन्हें मात्र 8.3 फीसदी प्रतिनिधित्व मिल सका था।
1962 के बाद हुए लोकसभा चुनावों में से अब तक सबसे ज्यादा 49 महिलाए 1999 में चुन कर आई थीं। जिसमें इस बार दस महिला सांसद का इजाफा हुआ है। इस बार सबसे अधिक १३ महिला सांसद उत्तर प्रदेश से आईं हैं। पश्चिम बंगाल से सात, मध्यप्रदेश से छह आंध्रप्रदेश से पांच गुजरात पंजाब व बिहार से चार चार महिला सांसद जीत कर आईं हैं।
पिछले आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो 1984 को छोड़कर 1996 से पहले हुए चुनावों में महिला सांसदों की गिनती 40 तक भी नहीं पहुची थी।1996 में 40 तो 1989 में 29 महिला सांसद चुनी गई थीं। सबसे कम महिलाएं 1977 में चुनी गईं थी उस वक्त लोकसभा पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या मात्र 19 रह गई थी।
11 वीं लोकसभा से अटका महिला आरक्षण विधेयक
महिलाओं ने अपनी शक्ति का लोहा मनवाते हुए बिना आरक्षण के ही दस फीसदी सीटों पर कब्जा किया है जबकि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाला महिला आरक्षण विधेयक आज भी पारित होने का इंतजार कर रहा है। यह पहली बार ग्यारहवीं लोकसभा में पेश किया गया था। तब से लेकर आज तक कई बार हंगामा तो हुआ है लेकिन महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो सका है। विधेयक का संसद में कई बार चीरहरण हो चुका है। जब पहली बार इसे 11 वीं लोक सभा में पेश किया गया था तो इसकी प्रतियां फाड़ी गई थीं।
वैसे तो भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर और विभिन्न प्रदेशों में कई महिला नेताओं का दबदबा रहा है लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि मायावती, जयललिता या ममता बैनर्जी जैसी नेत्रियों को छोड़कर ज्यादातर का नाता किसी न किसी राजनीतिक परिवार से ही रहा है। वर्ष 2004 के चुनाव में 355 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़कर 45 ने विजय श्री हासिल की थी। 1999 में 284 महिला उम्मीदवारों में से मात्र 49 ही जीत सकीं थी। पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में कुल 556 महिलाओं ने अपनी किस्मत आजमाई थी। इनमें सोनिया गांधी, दलित नेता चौधरी दलबीर सिंह की बेटी कुमारी शैलजा (अंबाला से), भटिंडा से सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर, चितौरगढ़ से गिरिजा व्यास, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले, सुनील दत्त की बेटी प्रिया दत्त और, विदिशा से सुषमा स्वाराज और ममता बैनर्जी, मेनका गांधी आदि प्रमुख रहीं।
विभिन्न लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या
वर्ष 2009-59
वर्ष 2004- 45
वर्ष 1999-49
वर्ष 1998-43
वर्ष 1996-40
वर्ष 1989-29
वर्ष 1977-19
वर्ष 1962-31
राजनैतिक दलवार महिला सासंदों की संख्या
वर्ष 2009 में महिला सांसद
कुल -महिला सासंद 59
कांग्रेस - 23
भाजपा - 13
तृणमूल कांग्रेस-4
समाज वादी पार्टी-4
बहुजन समाज पार्टी-4
जनता दलू यू-2
अकाली दल-2
राष्ट्रवादी कांग्रेस-2
तेलंगाना राष्ट्रसमिति-1
राष्ट्रीय लोकदल-1
शिवसेना-1
डीएमके-1
सीपीएम-1

सोमवार, 18 मई 2009

पेट्रोल पम्प कर्मियों के लिए पेट्रोल खतरनाक

मौजूदा दौर में पेट्रोल हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया हैं। शहर की तो छोड़े, गांव वाले भी इसके इतने आदि हो चुके है कि इसके बिना दो कदम चल नहीं सकते। लेकिन हम में से बहुत कम लोगों को पता होगा कि आम आदमी तक पेट्रोल पहुंचाने वालों को यह बेहद घातक साबित होता हैं। जब हम पेट्रोल पंप पर जाते है तो जो चेहरे हंसते-मुस्कुराते हमारा स्वागत कर पेट्रोल देते हैं उनके लिए पेट्रोल पंपों पर लगातार काम करना स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत खतरनाक होता हैं, वे अंदर से खोखला होते जाते हैं। २४ घंटे पेट्रोल की गंध उसके शरीर में बनी रहती है यह गंध हवा के द्वारा उनके सांसों के साथ फेफड़े में जाती है जो समूचे शरीर तंत्र को कमजोर बना देती हैं।
गंध से नशा होता और नशे से बीमारी
डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर अस्पताल के अधीक्षक एमडी डॉ. जी.बी. गुप्ता का कहना हैं कि पेट्रोल के वाष्पीकरण के बाद उसमें से गंध आती है जो सीधे फेफड़े तक जाकर शरीर में एक अजीब सा नशा की स्थिति पैदा करती है। यहीं नशा आगे जाकर ब्रॉकाइट्स जैसे घातक बीमारियों का कारण बन सकती है
औद्योगिक विष अनुशंधान कें्र लखनऊ के एक शोध के निष्कर्ष भयावह हैं। इनमें बताया गया है कि पेट्रोल पंप पर नंगे हाथों काम करने वालों को कई त्वचा संबंधी बीमरियों का भी सामना करना पड़ सकता हैं। शोध कहते है कि पोट्रल पंप पर काम करने वालों और गैराज में पेट्रोल वाहनों की मरम्मत करने वालों के रक्त मूत्र में सीसे (लेड) की मात्रा पाई गई है जो लीवर व गुर्दे को खराब करती हैं। इससे व एनीमिया, हृदय रोग और बेहरेपन का भी शिकार हो सकते हैं।
बचाव ही बेहतर है
डॉ. गुप्ता के अनुसार बचाव ही इसके बेहतर उपाय होते हैं। इसके लिए पूरे शरीर को ढ़कने से ऐपे्रन से ढ़के एवं हाथों में ग्लोब का इस्तेमाल करें। हमारे यहां एप्रेन तो पहन लेते है जबकि ग्लोब का इस्तेमाल कोई नहीं करता। लगातार पेट्रोल के संपर्क में न रहे। नौकरी को बदल-बदल कर करते रहना चाहिए।

पानी मे घुल रहा जहर

पानी जीवन का आधार है और ज्यादातर बीमारियों की जड़ दूषित पानी होता है। उसमें मौजूद तत्वों में बदलाव आम आदमी के स्वास्थ्य पर तुरंत असर डालते हैं। निर्धारित मात्रा के उपर नीचे होते ही स्वास्थ्य डगमगाने लगता है। इनमें मौजूद नाइट्रेट, लोहा, सल्फेट आर्सेनिक आदि तत्वों के बढ़ते ही स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालते हैं। जल के तत्वों की मात्रा में खतरनाक बदलाव आ रहे हैं। लगातार दोहन और रासायनिक खादों के अधाधुंध प्रयोग साथ ही उद्योगों से होने वाले प्रदूषण से पानी में हानिकारक रसायनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही एक बड़ा भाग प्लास्टिक और सीमेंट से ढंकने के कारण वर्षा जल भूमि में नहीं जा पा रहा जिसे पानी के इन बदलावों को जिम्मेदार माना जा रहा है।
प्रकृति द्वारा मुफ्त में मिलने वाला पानी भी शुद्ध नहीं रहा। पानी में आर्सेनिक, फ्लोराईड, लोहा, नाईट्रेट आदि की मात्रा स्वास्थ्य को दुष्प्रावित करने वाली स्थिति में पहुंच गई है।
कें्रीय भूजल बोर्ड के शोंधों के आधार पर जारी रिर्पोट में प्रदेश के अनेक क्षेत्रों के पानी में मौजूद तत्वों में खतरनाक स्तर तक बढ़ोत्तरी हुई है। इन में त्वचा कैंसर के लिए जिम्मेदार आर्सेनिक, सल्फेट, दांत के रोंगो का कारण फलोराईड व नाइट्रेट आदि शामिल हैं।
शुद्ध पानी में सल्फेट का मानक स्तर चार मिलीग्राम प्रति लीटर है फ्लोराईड की अधिक मात्रा दातों सहित हड्डी संबंधी परोशानियों को जन्म देती है। इसका मानक स्तर १.५ पीपीएम है। शरीर के लिए बेहद घातक एवं त्वचा रोगों का कारण आर्सेनिक तो कई गुना बढ़ा हुआ है। इसका मानक स्तर ०.५ मिलीग्राम प्रति लीटर है।
लगातार गिर रहा भूजल स्तर
केन्द्रीय भूजल बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। यह भूजल स्तर ४ से ७ मीटर तक नीचे जा चुका है, बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, कम वर्षा और जमीन पर हो रहे निर्माण कार्यों खासकर जमीन को सीमेंट से घेरने कारण यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, इसकी वजह से भूजल का पुनर्चक्रीकरण और पुनर्भरण नहीं हो पाता है।इसके अनुसार ७३ प्रतिशत से अधिक कुओं का जलस्तर कई मीटर तक गिर चुका है

शुक्रवार, 15 मई 2009

मारा गया तो बस आदिवासी

देश-प्रदेश में चलाए जा रहे नक्सली आंदोलन का खामियाजा यदि किसी ने भुगता है तो वह आदिवासी और गरीब आवाम हैं। इस पूरे खेल में एक तरफ आदिवासी और गरीबों के कथित हितैशी और दूसरी ओर जनता द्वारा जनता के लिए चुनी जाने वालीं सरकारें हैं। हितैशी ओर सरकारी तंत्र दोनों ही आम आवाम के हित के लिए कार्य करने का दावा करते हैं लेकिन सर्वाधिक नुकसान उसी आवाम का हो रहा है। दोंनों ओर मरने वाले आदिवासी ही हैं। इस खूनी खेल में चलने वाली अधिकांश गोलियां आम आदमी के सीने को छलनी करती हैं जिसका कोई कुसूर नहीं है। इस आम आवाम में एक ओर वे सिपाही होते हैं जो अपने माता-पिता के अरमानों को पूरा करने और देश सेवा करने के लिए पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों में जीतोड़ मेहनत कर भर्ती होते हैं। दूसरी ओर आम आवाम के वे लोग होते हैं जिन्हें गरीबी का भय और अमीर होकर समानता का दिवा स्वपन दिखाकर पूज्य पेड़ों, बड़ेे देव व माता-पिता की शपथ दिलाकर बिना उनकी इच्छा के हथियार पकड़ा कर सुरक्षा प्रहरियों के समक्ष खड़ा कर दिया जाता है। जब एक बार कोई सुरक्षा एजेंसियों या उनके दूसरी ओर हथियार लेकर खड़ा हो जाता है तो उसके समक्ष सिवाय आगे बढऩे के कोई चारा नहीं रह जाता है। आगे बढऩा उसकी मजबूरी हो जाती है। मौत को सामने महसूस करने के बावजूद दोंनो ही आगे बढ़ते हैं क्योंकि दोनों को ही मां की कसम धरती मां की खातिर दिलाई जाती है और दोंनों को ही मां अपनी जान से प्यारी होती है। दोंनों की मां एक होने के बावजूद कुछ कू्रर शातिर अलग अलग मां होने का भ्रम रचकर आपस में लड़ाने में सफल हो जाते हैं। एक देश के सविंधान के अनुसार मां की खातिर लड़ता है तो दूसरा अपने सविंधान के अनुसार मां की खातिर जान जोखिम में डालता है। दोंनो ही आपस में एक ही मां की खातिर लड़ जाते हैं जिसका अंजाम यह होता है कि जीते कोई छलनी मां का सीना ही होता है। मरना मां के एक बेटे को ही पडऩा पड़ता है। पश्चिम बंगाल के नक्शलवाड़ी से प्रारंभ हुए इस कथित आंदोलन का स्वरूप के सााि ही लक्ष्य भी बदल गए हैं। आदिवासी और गरीबों की खातिर होने वाली इस लड़ाई में आदिवासी ही सर्वाधिक मारे जा रहे हैं। अब तक अकेले प्रदेश में ही लगभग एक लाख आदिवासी या तो बेघर हो गए हैं या जिस माटी की खातिर लड़ाई प्रारम्भ की थी उससे बहुत दूर हो गए हैं। कैंपो में जीने को मजबूर इन आदिवासियों की परम्पराएं माटी में मिलती जा रही हैं। दोनो ओर आदिवासी ही मारे जा रहे हैं। जबकि दोंनों ओर लड़ाई कों संचालित करने वाले अपने महलों में सुरक्षित हैं। आदिवासियों की खातिर कथित आदिवासियों द्वारा चलाई जाने वाले खूनी खेल में खून भी आदिवासयों का ही बह रहा है। जबकि इसके पीछे सैकड़ों की तिजोरियां लबालब भर गईं हैं। इनमें सरकारी तंत्र के वे अधिकारी और नेता है जो नक्सलियों को रोकने के लिए आ रहे पैसे को अपनी तिजोरियों को भरने में लगा रहे हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र के वे बनिया भी शामिल हैं जो आदिवासी क्षेत्रों में दुकान खोलकर भोले भाले आदिवासियों को मुंहमागे दामों पर नमक तेल बेच रहे हैं। इनमें वे कथित आदिवासी हितैशी भी शामिल हैं जो नक्सली आंदोलन चलवाने के नाम पर कुछ नक्सल समर्थक सरकारों से पैसा ले रहे हैं। यह पूरा खेल आदिवासियों के हित में कहीं भी नहीं हैं। आदिवासियों के बीच ही कुछ ऐसे आदिवासी हो गए हैं जो गैरों के हाथ बिक गए हैं और भोले आदिवासियों की अशिक्षा का फायदा उठाकर उन्हें सविंधान के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं। आदिवासियों को चाहिए कि वे अपने बीच घुस आए गद्दार आदिवासियों को पहंचाने, एवं उनके नापाक इरादों को अंजाम तक न पहुंचने दें। सरकारी तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व में बैठे आदिवासियों को चाहिए कि वे आदिवासी हितों की योजनाओं को उन तक पहुंचाने में ईमानदारी का परिचय दें। वरना पिछले कई दशकों से साजिश के तहत संघर्ष में ङाोंका गया पूरा समाज ही समाप्त हो जाएगा और कथित आदिवासी हितैसियों के नापाक मंसूबे सफल हो जाएंगे।

बुधवार, 13 मई 2009

मंदी ने दिखाई भक्ति की राह

जब जब परिस्थतियां मानव समाज के सामने जटिलताएं पैदा करती हैं तब तब वह अध्यात्म के सहारे रास्ता ढूंढता रहा है। ऐसा ही कुछ मौजूदा मंदी के दौर में देखने को मिल रहा है। मंदी के प्रभाव से उपजने वाले तनाव को दूर करने के लिए आम व खास सभी भक्ति, भगवान, मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारा, अध्यात्म की ओर मुड़ रहे हैं। ज्योतिष को अवैज्ञानिक मानने वाले सूचना तकनीक के पैरोकार व उद्योगपति भी अब उसके सहारे अपने बेहतर समय को खोज रहे हैं। गृह-नक्षत्रों को अपने पक्ष में करने के उपाय किए जा रहे हैं। ज्योतिषों व पंडितों की पूंछ परख लगातार बढ़ रही है।
विश्वव्यापी मंदी ने कृषि प्रधान होने के बावजूद कुछ हद तक ही सही देश-प्रदेश को अपनी चपेट में लिया है विशेषकर शहरी वर्ग और उद्योगों से जुड़े लोगों को मंदी की सुरसा प्रभावित कर रही है। लगभग सभी प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। यहां तक की व्यवसायिक पाठ्यक्रमों प्रबंधन, सूचना तकनीक, इंजीनियरिंग, पत्रकारिता आदि में अध्यनरत युवा भी गहरे तनाव में हैं। इस तनाव को दूर करने के लिए वे सब मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारों का सहारा ले रहे हैं। इन दिनों कर्म पर भरोसा करने वाले युवा भी कर्म के साथ मन को शांत रखने के लिए भक्ति का सहारा ले रहे हैं। यदि हम कुछ वर्षों पूर्व में जाएं तो युवाओं के साथ ही आम आदमी कर्मवादी हो चला था, उसे अपनी शिक्षा और योग्यता पर पूरा भरोसा था, वह मंदिर-मस्जिदों या भक्ति से थोड़ा सा दूर होता नजर आ रहा था। अभिभावक भी बच्चों के व्यवहार से ज्यादा चिंतित नहीं थे क्योंकि चारो तरफ शिक्षित होने वालों को मोटे वेतन की नौकरियां मिल रहीं थी। अध्यात्म का योगदान नजर नहीं आ रहा था। लेकिन जब से मंदी ने देश में कुछ हद तक और विदेश में बड़े पैमाने पर असर दिखाया तो सभी को परमपिता की याद आई और विभिन्न रूपों में उन्हें याद किया जाने लगा है। पूजा आराधना स्थलों पर जाने वालों की संख्या में एकाएक वृद्धि हो रही है। लोग पंडित-मौलवियों से शांति की राह पूछ रहे हैं। मंदिरों में दोनो वक्त दर्शनार्थी पहुंच रहे हैं तो पांच वक्त अजान करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। बाबा रामदेव के योग शिविरों, पं.श्री रविशंकर के निर्देशन में चलने वाले आर्ट आफ लिविंग की कक्षाओं में पहुंचने वाले अब पहले से ज्यादा हो गए हैं।
बढ़ा है ज्योतिष पर भरोसा
मंदी ने बड़े-बड़ों को पानी पिलवा दिया है। देश भर में ज्योतिषीय परामर्श देने वाले मुकेश जैन बताते हैं कि मंदी के बाद से उनके पास परामर्श लेने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। ज्यादातर उद्योगपति व युवा, महिलाएं आदि उनके पास जाकर परामर्श ले रहे हैं एवं बताए गए उपायों को पूरी श्रद्धा के साथ अपना रहे हैं। श्री जैन के अनुसार लोगों में ज्योतिष के प्रति विस्वास और मजबूत हुआ है।
बढ़ी नक्षत्रों के नगों की वृद्धि
मालवीय सड़क पर स्थित सुमित ज्वेलर्स के संचालक अशोक काकडिय़ा बताते हैं कि मंदी के बाद खरीददारों की संख्या तो घटी लेकिन नक्षत्रों संबंधी नगों हीरा, मोती, गोमेद, पुखराज, माणिक्य आदि खरीदने वालों की संख्या बढ़ी है।
अध्यात्म ही दिलाएगा शांति
पं.मोहन मुरारी के अनुसार मंदी से उपजे तनाव से शांति केवल अध्यात्म ही दिला सकता है क्योकि यही वह मार्ग है जो थोड़े में संतोष करने की सीख देता है और कर्म करने के बाद कर्मफल परमपिता पर छोडऩे के लिए कहता है। उनके अनुसार लोग पूजा आराधना संबंधी परामर्श बड़ी संख्या में आ रहे हैं। विशेषकर शहरी वर्ग में मंदी ने एक बार फिर भक्ति की अलख को मजबूत कर दिया है।

मंदी से पुनर्जीवित हुआ कार्ल मार्क्स

वर्तमान विश्वव्यापी आर्थिक संकट ने छोटे-बड़े सभी देशों की कमर तोडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सरकारें और उद्योगपति इससे बचने के उपाय तो कर रहे हैं लेकिन, नतीजा सिफर रहे। इस संकट की घड़ी में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के धुर विरोधी कार्लमाक्र्स को एक बार फिर याद किया जा रहा है। उनकी पुस्तकों में मंदी का इलाज ढूंढ़ा जा रहा है।
लोग नेट से लेकर बाजार तक माक्र्स के साहित्य को खंगालने में लगे हुए हैं। लगता है कि पूंजीवाद के हिमायतियों को चिढ़ाने के लिए माक्र्स इतिहास के मलबे से बाहर निकल आया हो। कुछ दिनों पहले जर्मनी के वित्तमंत्री पीयर ने यह कहकर सभी को हैरत में डाल दिया किवर्तमान समस्याओं को हल करने के लिए माक्र्स के सुङााए रास्ते पर चलना गलत न होगा। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी भी उनकी लिखित पुस्तक दास कैपिटल को पढ़ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, एक जर्मन फिल्मकार एलेक्जेंडर क्लूग ने तो दास कैपिटल पर एक फिल्म बनाने की भी घोषणा कर दी है। अर्थशास्त्री बताते हैं कि माक्र्स पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था को समाज के लिए अहितकर मानते थे। उनका मानना था कि जब तक आम आदमी की आय नहीं बढ़ेगी तब तक समाज सुखी नहीं होगा और न ही अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। लालची अमेरिकी बैंकरों ने बोनस कमाने की होड़ में घरों को गिरवी रखकर लोगों को कर्ज देने का सिलसिला शुरू किया और इन कर्जों की ऊंची क्रेडिट रेटिंग करवा कर उनके आधार पर बनाए गए बॉण्ड और प्रतिभूतियां सारी दुनिया को बेचकर बेवकूफ बनाने की कोशिश की, उसकी परिकल्पना माक्र्स ने वस्तुओं को व्यापार करने योग्य संपदा में परिवर्तित करने की बात कह कर की थी।
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माक्र्स के सिद्धांतों में मंदी से बचने के उपाय हैं। उनके अनुसार, पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपति श्रमिकों को
केवल जीवनयापन लायक पैसा देते हैं। इससे आम आदमी के पास खरीदारी के लायक पैसा नही होता। एक समय बाद उत्पादन अधिक और उसके खरीदार कम हो जाते हैं और मंदी आ जाती है। यदि काम करने वालों को भरपूर पैसा दिया जाए तो वे उसे बाजार में खर्च करेंगे और उत्पादन खपता जाएगा। बेहतर मजदूरी ही मंदी को उत्पन्न ही नहीं होने देगी।
व्याख्याता बीएल सोनेकर
प. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
माक्र्स का घोषणा पत्र
पिछले साल जो विश्वव्यापी संकट अमेरिका से शुरू हुआ, उसकी कल्पना माक्र्स ने १६० साल पहले ही कर ली थी। वर्ष १८४८ में फ्रेडरिक एंजेल्स के साथ मिलकर उन्होंने जो कम्युनिस्ट घोषणापत्र तैयार किया था, उसमें खींची दुनिया की आर्थिक संकट की तस्वीर आज से काफी मिलती है।
घोषणा में कहा गया था कि आधुनिक बुर्जुआ समाज एक जादूगर की तरह है... उसने उत्पादन और विनिमय के इतने दैत्याकार साधन खड़े कर लिए हैं,..जिनकी वजह से मालिकों का मुनाफा दिन-रात बढ़ता जा रहा है और मजदूर लगातार गरीबी के गर्त में गिरते जा रहे हैं... आए दिन जो आर्थिक संकट पैदा होते रहते हैं, उनसे बुर्जुआ वर्ग के अस्तित्व और सत्ता को खतरा पैदा हो गया है... इन संकटों के दौरान अत्यधिक उत्पादन की ऐसी महामारी चारों तरफ फैलने लगती है,...अचानक समाज अपने आपको आर्थिक बर्बरता के बीच फंसा महसूस करने लगता है और ऐसा महसूस होने लगता है मानो किसी अकाल या सार्वभौमिक विनाशकारी युद्ध ने हमारे अस्तित्व के
लिए जरूरी समस्त साधनों को हमसे छीन लिया है। तब ऐसा लगता है जैसे सारे उद्योगों और व्यापार का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है... लेकिन ऐसा
होता क्यों है? इसका एकमात्र कारण यह है कि हम जीवन के असीम साधनों, उद्योगों और व्यापार को इतना अधिक बढ़ा देते हैं कि वह किसी राक्षस की
तरह हमें ही निगल जाने के लिए अपना मुंह खोलने लगता है। और इस प्रकार जिन चीजों का विस्तार बुर्जुआ समाज ने अपने आपको मजबूत बनाने के लिए किया था, वे ही उसकी दुश्मन बन जाती हैं।

गेरू करती थी खाद्यान की सुरक्षा

आधुनिक समय में तरह-तरह के कीटनाशक बाजार में आकर बेअसर साबित हो रहे हैं। अनाज तो नहीं बच रहे उलट किसान इन महंगे कीटनाशकों से लुटने पर मजबूर हैं। लेकिन ईशा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी शातवाहन काल में किसानों के पास बेहद प्रभावी और आसानी से उपलब्ध कीटनाशक गेरु था जिससे वे अपने अनाज की सुरक्षा करते थे। ऐसे प्रमाण सिरपुर की खुदाई में मिले हैं। यहां मिले अनाज भंडारों में गेरु के टुकड़े पाए गए हैं।
सिरपुर में पुरातात्विक सलाहकार अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में चल रही खुदाई हर दूसरे रोज जमीन में दफन नए नए राज उगल रही है जिनसे उसकाल की समृद्ध सभ्यता और संस्कृति की जानकारी तो मिलती ही है। साथ ही उस समय की कृषि और उससे संबधित अन्य राज भी सामने आ रहे हैं जो आज भी कारगर हो सकते हैं। हाल ही में यहां आयुर्वेदिक कुंड, अनाज भंडार व वैदिक पाठशाला के अवशेष मिले हैं। इनमें से आयुर्वेदिक कुंड व अनाज भंडार शतवाहन काल ईसा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी के हैं जबकि वैदिक पाठशाला शरभपूर्या काल पांचवी-छटवीं शताब्दी की हैं। खुदाई के दौरान नगर संरचना में पत्थर से बने लंबे भूमिगत कमरों के अवशेष मिले हैं। इन्हें ढंकने की भी पुख्ता व्यवस्था की गई है। यह कमरे उस काल के अनाज भंडार माने जा रहे हैं। कमरों में गेरु के टुकड़े भी हैं जो उस काल में अनाज की सुरक्षा के उपायो की ओर इशारा करते हैं। आयुर्वेदिक कुंड के पास होने और इनके पत्थरों से बने होने के कारण इनमें चूहे तो पहुंचते ही न होंगे,अनाज को दीमक , घुन या अन्य इसी तरह के अन्य कीटों से सुरक्षा के लिए इनमें गेरु डाली जाती थी। गेरु के टुकड़े भूमिगत कमरों से प्राप्त हुए हैं।
आयुर्वेदिक कुंड में मिटते थे चर्मरोग
खुदाई में नगर सरंचना के तहत ३.६० मीटर के पत्थर कुंड मिले हैं। कुंड के पास ही तुलसीचौरा है। जिसका पानी एक भूमिगत नाली के माध्यम से कुंड में जाने की व्यवस्था है। साथ ही कुंड से एक भूमिगत नाली जल निकासी है। इनकी संरचना बताती है कि इन कुंडो के पानी का उपयोग विभिन्न चर्मरोंगों को ठीक करने के लिए किया जाता रहा होगा। इसमें तुलसीचौरा में लगी तुलसी को जल अर्पित करने पर पानी पत्तियों, शाखाओं और जड़ों से होकर कुंड में पहुंचता होगा। जो चर्मरोंगों को ठीक करने में कारगर होता है। संभवना है कि इसमें कुछ अन्य पत्तियां जैंसे नीम आदि को डाला जाता रहा होगा। इसे विभिन्न तरह के आयुर्वेदिक लेपों से होने वाली चिकित्सा से जोड़कर देखा जा रहा है।
तालाबों के बीच होती रही पढ़ाई
शरभपूर्या काल में सिरपुर के छात्र आठ तालाबों के बीच बनी वैदिक पाठशाला में वेदों का अध्यन करते थे। यहां रामकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर डेढ़ मीटर चौडें व दस मीटर लंबे बरामदे मिले हैं। इनके बीचों बीच स्थापित भगवान श्री विष्णु की १.१० मीटर की प्रतिमा इसके पाठशाला होने की ओर संकेत करती है। माना जाता है कि इस काल में वेदों के विरुद्ध मूर्तिपूजा चरम पर थी और पाठशालाओं में मूर्ति स्थापित कर उनके समक्ष ही विद्याअध्यन किया जाता था। पाठशाला रायकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर है। इसके पास ही आचार्यों के कमरे हैं। चारों ओर आठ तालाब हैं जिनमें आज भी कमल खिलते हैं।
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सिरपुर उत्खनन में नगर संरचना के बीच सार्वजनिक मकान में पत्थर के कुंड, निजी मकान में भूमिगत कमरे व रायकेरा तालाब के पूर्व में बरामदे मिले हैं। जिनमें से सार्वजनिक मकान में मिला कुंड आयुर्वेदिक कुंड की तरह है। यहां प्राप्त अनाज भंडार में गेरु के टुकड़े उस काल में कीटों से अनाज की सुरक्षा के उपायों को बताते हैं। साथ ही बरामदे की लंबाई चौड़ाई और उसके बीचों बीच स्थापित विष्णु की प्रतिमा शरभपूर्या काल की वैदिक पाठशाला की ओर इशारा करती है।
अरुण कुमार शर्मा
पुरातात्विक सलाहकार मानक
निदेशक सिरपुर खुदाई छत्तीसगढ़ शासन

सोमवार, 11 मई 2009

बढता प्रदुषण क्षय का कारण

एक समय था जब टीबी या क्षयरोग को गांव या गंदी बस्तियों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, शहरी क्षेत्रों में भी क्षय रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है जिसका एक बड़ा कारण प्रदूषण है। स्वास्थ्य विभाग के उप संचालक दीनानाथ ने बताया कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में रोगियों की संख्या लगभग बराबर है। शहरी क्षेत्रों में रोग का मुख्य कारण धूल और बढ़ता प्रदूषण है जबकि गांवों में इसकी मूल वजह कुपोषण है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में क्षयरोगियों की संख्या में कमी आई है जो नियंत्रण के प्रशासनिक उपायों की सफलता कही जा सकती है। यदि लोग जागरुकता का परिचय दें तो इसमें और कमी आ सकती है। उन्होंने बताया कि अब स्थिति बेहतर हो रही है। वर्ष ०७ की अपेक्षा ०८ में क्षय रोगी कम हुए हैं। उन्होंने बताया कि क्षय रोग के नए मामलों में लगभग दो तिहाई की कमी आई है। श्री देवांगन के अनुसार लगभग ८४ प्रतिशत रोगी इलाज से ठीक हो रहे हैं।
पच्चीस फीसदी में पाए गए लक्षण
स्वास्थ्य संचालनालय से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करने पर स्थिति की भयावहता स्पष्ट हो जाती है। वर्ष २००८ में कुल एक लाख आठ हजार चार सौ उन्तालीस संदेहास्पद लोगों की जांच की गई थी जिसमें से लगभग पच्चीस फीसदी से अधिक सत्ताइस हजार दो सौ अठत्तर लोगों में क्षयरोग के लक्षण पाए गए। इनमें ग्यारह हजार दो सौ चालीस लोगों में संक्रामक टीबी के रोगी मिले। इसके पूर्व वर्ष २००७ में प्रदेश में कुल रोगियों की संख्या सत्ताइस हजार पांच सौ चार थी।
कैप्टन ऑफ डेथ से प्रतिदिन मरते एक हजार
विश्व क्षय दिवस डॉ. रॉबर्ट कोक्स के जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने इसके जीवाणु की खोज की थी। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसे मास्टर ऑफ डेथ या कैप्टन ऑफ डेथ भी कहा जाता है। आज तक विश्व में किसी रोग या प्राकृतिक आपदा या विश्व युद्ध ने इतनी जानें नहीं ली हैं, जितनी टीबी ने ली है। भारत में हर दिन पांच हजार लोगों को टीबी की बीमारी होती है और प्रतिदिन एक हजार लोग इससे मर जाते हैं।
उपचार बीच में छोडऩा खतरनाक
उप संचालक दीनानाथ देवांगन बताते हैं कि क्षयरोग हो जाने पर इसे पूर्णत: ठीक किया जा सकता है लेकिन उसके लिए आवश्यक है कि डाट्स के तय समय तक नियमित रूप से खाया जाए। लेकिन ऐसे प्रकरण अक्सर आते हैं कि क्षयरोगी द्वारा डाट्स खाना बीच में ही छोड़ दिया जाता है। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। क्योंकि ऐसा करने से रोगी के अंदर मौजूद क्षयरोग के जीवाणु डाट्स से लडऩे की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं और रोगी को और डेढग़ुना ज्यादा समय तक दवा खानी पड़ती है। इसके अलावा इस प्रकार के रोगी के संपर्क में आने से जो नए रोगी पैदा होते हैं उनपर भी डाट्स का नियमित कोर्स असर नहीं करता है। क्षय रोग के अंतर्गत एमडीआर टीबी ऐसी परिस्थिति है, जिसमें टीबी की आम औषधियां काम नहीं करती हैं। वहीं अब तो इससे भी खतरनाक टीबी जिसे एक्सडीआर टीबी कहा जाता है, वह भी बढ़ रही है। इस तरह की टीबी में कोई दवा काम नहीं करती है। क्षयरोगियों को चाहिए कि वे डाट्स खाना बीच में न छोड़ें।

नशेब नही होते चार कंधे

आम आदमी की तमन्ना होती है कि शांति पूर्वक जीवन के बाद उसकी अंतिम यात्रा चार कंधो पर हो, लेकिन बढ़ती आपाधापी और संवेदन शून्य होते समाज में अब अंतिम यात्रा के लिए चार कंधे भी नसीब नहीं होते हैं। इस तरह के उदाहरण शहर में हर रोज देखने को मिल जाते हैं। अंतिम संस्कार में शामिल होने अब आवश्यक संख्या में लोग नहीं पहुंचते और शव चार कंधो के स्थान पर किराए की गाड़ी पर ले जाया जाता है।
शहर में देवेन््र नगर स्थित मुक्तिधाम, महादेव घाट व मारवाड़ी शमसान घाट सहित छोटे बड़े लगभग आधा दर्जन से शमसान घाट हैं। इनमें लगभग हर रोज अंतिम संस्कार होता है। जहां पहुंचने वाली शवयात्रा में बदलाव स्पष्ठ देखे जा सकते हैं। शमसान घाट पहुंचने वाली मृत देह अब चार कंधों पर नहीं बल्कि चार पहियों पर पहुंचती है। यह मृत व्यक्ति की अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं वरन मजबूरी वश होता है। क्योंकि मौत पर अब पड़ोसी भी नहीं पहुंचते,पुण्य का काम माने जाने वाले अंतिम संस्कार में नफा नुकसान को आंका जाने लगा है। मृतक कोई उद्योगपति, राजनेता या अन्य इसी प्रकार का बड़ा नाम होता है तो उनकी शवयात्रा में जाने वालों और उनके घर पहुंच कर मगरमच्छ के आंसू बहाने वालों की भीड़ लगी रहती है। आम आदमी हुआ तो उसके यहां पहुंचने वाले नजदीकी रिस्तेदार ही होते हैं। जिनके पास थोड़ी बहुत संवेदनां होती है वे भी गाडिय़ों से सीधे शमसान घाट पहुंचते हैं और वहां भी वे अपने धंधे की या अन्य तरह की बातों में मशगूल रहते हैं। राजधानी में शमसान घाट तक शव ले जाने वाली गाडिय़ों की संख्या लगातार इजाफा हो रहा है। इसके बावजूद मृतक के परिजनों के लिए अंतिम संस्कार के लिए कई घंटे तक इंतजार करना पड़ता है क्योंकि यह गाडिय़ां इतनी व्यस्त होती है कि उनके संचालकों को एक ही समय पर चार पांच स्थानों से एक साथ इन गाडिय़ों के बुलावे की सूचना आती है। जो इस बात का प्रमाण हैं कि चार कंधे मिलना भी अब बीती बात होने वाली है। इस संबंध में समाज सेवी अनिल गुरुवक्षाणी कहते हैं कि मौजूदा समय में सवेंदन शून्यता तो निश्चित बढ़ी है। आम आदमी के पास समय की कमी और दूर-दूर शमसान घाट होने के कारण लोग पैदल जाने की अपेक्षा गाड़ी से जाना पसंद करते हैं। यह जरूरी तो नहीं लेकिन आपाधापी की जिंदगी में कम पड़ते समय में आवश्यता सी बन गई है।
ह्यह्यशहर में शमसान घाट तक शव ले जाने वाले तीन वाहन हैं जिन्हें स्वर्ग रथ कहा जाता है। इनमें से एक मारवाड़ी युवा मंच के पास है जब कि दो बढ़ते कदम संस्था संचालित कर रही है। इनकी मांग दिन ब दिन बढ़़ रही है। कभी कभी तो एसा समय आता है जब एक ही समय में तीन चार स्थानों से एक साथ बुलावा आ जाता है। इसका बड़ा कारण लोगों के बीच बढ़ती दूरियां हैं। कभी कभी तो यह भी देखने को मिलता है कि शव गाड़ी के इंतजार में रखा रहता है जब तक गाड़ी नहीं पहुंचती तब तक अंतिम यात्रा नहीं निकल पाती है।
इं्रकुमार डोडवाणी(अध्यक्ष)
समाज सेवी संस्था बढ़ते कदम

गीता के आधार पर गढ़ रही जातियां

इसे समय की mang कहें या अर्थसत्ता का प्रभाव कि जातियों के बंधन टूट रहे हैं। इसके साथ ही व्यवसाय के पारम्परिक बंधन भी
शिथिल हो गए हैं। ब्राम्हण वर्ण में पैदा होने वाले व्यक्ति धार्मिक कर्मकाण्ड छोड़ अन्य कार्यों में संग्लग्र हो गए हैं, वहीं कल तक अछूत माने जाने वाले और कर्मकाण्ड से दूर रहने वाले वर्ण के लोग धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पन्न कराने लगे हैं। उनके मुख से निकलने वाले संस्कृत के श्लोक सुखद अहसास
कराते हैं। इस परिवर्तन में
श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित वर्ण व्यवस्था नए सिरे से बनती नजर आ रही है। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि 'चातुर्वण्य मया सृष्टं गुणकर्म
विभागश:ज् अर्थात चार वर्णों का निर्माण मुङा परमशक्ति के द्वारा गुण कर्म के आधार पर किया गया है। मौजूदा समय में इसी गुण कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था परमशक्ति का एक स्वरूप कुदरती आधार पर निर्मित हो रही है। कल तक विभिन्न समारोहों में बैण्ड बजाने का कार्य एक विशेष जाति करती थी, लेकिन अब इस कार्य में अन्य
जातियों के लोग भी मिल जाते हैं। ब्राम्हण के लिए आरक्षित माने जाने वाले धार्मिक कर्मकांड को अब अन्य जातियों के लोग भी सम्पन्न करा रहे हैं। सुरक्षा के लिए नियत क्षत्रिय वर्ण के लोग वैश्य का कृषि कार्य करते मिल जाते हैं। सुरक्षा सेनाओं में ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र आदि सभी वर्णों के लोग मिलते हैं। शिक्षा देने भी में सभी जाति के लोग संलग्र हो चुके हैं। इसी तरह कल तक बाल काटने का कार्य केवल नाइयों के भरोसे होता था, लेकिन अब सवर्ण भी इस कार्य में शामिल हो रहे हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण बालों के विशेषज्ञ जावेद हबीब द्वारा संंचालित वे विद्यालय हैं जिनमें बालों को सजाने संवारने का प्रशिक्षण लेने सभी वर्णों के युवक पहुंच रहे हैं। आकार लेती इस नई वर्ण व्यवस्था को इस आधार पर और बल मिलता है कि यह व्यवसायिक कार्य उनके शादी सम्बन्धो में भी महत्वपूर्ण
भूमिका निभाने लगे हैं। एक
चिकित्सक या उसके बेटे की शादी चिकित्सक के ही परिवार में किया जाना Ÿोयस्कर माना जाता है। सैनिक परिवार शादी सम्बन्ध करते समय सैनिक परिवार ही देखता है। इसी तरह किसान चाहे वह किसी भी जाति का हो वह विवाह सम्बन्ध करते वक्त किसान परिवार ही ढूंढ़ता है। इसका बड़ा कारण विचार मिलने और भविष्य में किसी
तरह का टकराव न होने की सोच के चलते होता है। मौजूदा समय में किसान, व्यवसायी, उद्योगपति आदि वर्गों में सभी वर्णों के लोग मिलते हैं। इस सम्बन्ध में समाज शाष्त्र के प्रोफेसर प्रमोद शर्मा कहते हैं कि वर्ण आधारित पारपम्परिक व्यवसाय अब नहीं बचे हैं। आर्थिक सत्ता के मजबूत होने से जिसे जो भा रहा है व्यवसाय कर रहा है।
वर्षों से जन्म आधारित व्यवस्था टूट कर कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था बन रही है।
भौतिकवादी युग की आवश्यकता
दर्शन शाष्त्र के प्रोफेसर डॉ. भगवंत सिंह कहते हैं कि अर्थव्यवस्था और
भौतिकवादी युग के चलते यह आवश्यक हो गया है कि जिसे जो अच्छा लगे, वह व्यवसाय करे। क्योंकि मौजूदा समय अर्थ प्रधान हो गया है। ऐसे में वर्ण आधारित व्यवसायिक परम्पराएं टूट रही हैं और नए सिरे से समाज का व्यवस्थापन हो रहा है। इसे गीता के आधार पर समाज का पुनर्गठन कहा जा सकता है लेकिन यह प्राथमिक अवस्था ही है, एक लम्बे समय बाद
संभव है कि कर्म के आधार पर बने वर्ण पूर्ण रूप से सामने आए। यह गीता में वर्णित गुण कर्म के आधार पर निर्मित वर्ण व्यवस्था का पुनस्र्थापन है।

गौ मूत्र बचाए बायपास सर्जरी से

जब किसी अपने को हृदय रोग होने की जानकारी होती है तो दिल बैठने लगता है, यदि आर्थिक स्थिति कमजोर हुई तो फिर भगवान से दुआ मांगने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता लेकिन चिंता करने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि देशी गाय के मूत्र पान करने और कुछ अन्य आयुर्वेदिक उपचार से हृदय की धमनियों में रक्त प्रवाह में पैदा हुए अवरोध दूर किए जा सकते हैं और बायपास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस आयुर्वेदिक उपचार की सबसे बड़ी विशेषता यह कि इससे रोग से निवृत्ति हो जाती है और पुन: इलाज की
जरूरत नहीं पड़ती। जबकि बायपास सर्जरी में जीवन में भर दवाइयां खानी पड़ती हैं और पुन: सर्जरी भी करानी पड़ जाती है। आयुर्वेदिक इलाज का
लोहा मुंबई के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मनु कोठारी भी मानते हैं। यह इलाज उनके लिए संजीवनी सिद्ध हो सकता है जो रोग से पीडि़त हैं और आर्थिक या शारीरिक रूप से अक्षम हैं।
जानकारी के अनुसार आयुर्वेद में हृदय रोग से पीडि़त व्यक्ति के सीने पर एक
लेप लगाया जाता है साथ ही उसे कुछ पेय पिलाए जाते हैं इसके साथ ही उसे सुपाच्य भोजन दिया जाता है। लगभग पैंतालीस दिन तक चलने वाले इस आयुर्वेदिक उपचार के बाद रोगी निरोगी हो जाता है।
बीस मिलीग्राम गौ-मूत्र दूर करे हृदय की रुकावटें
आयुर्वेद में अधिकांश रोगों में प्रयुक्त होने वाला गौ मूत्र हृदय रोग को दूर करने में भी अहम भूमिका निभाता है। बछिया या देशी गाय का बीस मिली ग्राम गौ मूत्र सुबह शाम पीने से व इसके बाद सात तुलसी के पत्ते खाकर एक चम्मच शुद्ध शहद खाने से रक्त
पतला हो जाता है, जिससे रोग से निवृत्ति मिलती है।
आयुर्वेदिक लेप
इसमें काले उड़द की दाल रात में गौमूत्र से भिगोई जाती है सुबह उसे गुग्गल के साथ बारीक पीस कर अरंडी के तेल और देशी गाय के मक्खन में मिलाकर लेप बनाया जाता है। सुबह गाय के गोबर के लेप से हृदय स्थल में उबटन कर नहा लिया जाता है। नहाने के बाद बनाए गए लेप को हृदय से गले तक लगाकर सीधे लेट कर लगभग तीन घंटे तक आराम किया जाता है। उसके बाद अरंडी के पत्तों को चिकनी सतह की तरफ से लगाकर मुलायम कपड़े से बांध दिया जाता है। इसे चौबीस घंटे
तक बंधे रहने तक दूसरे रोज नहाते हैं। पुन: गोबर के उबटन से नहाते हुए पुन: लेप लगाते हैं, यह ४५ दिन तक प्रक्रिया दोहराई जाती है। इससे धमनियों में जमा अवरोध, नाडिय़ों की रुकावटें पिघल कर बाहर से ही दूर हो जाती हैं और रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है।
लेप लगाने के साथ ही हृदय रोगी को पेय दिया जाता है जिसमें छिलका सहित लौकी को घिस कर, तुलसी व पुदीना के दस-दस पत्ते मिलाकर पीस लिया जाता है और इसके रस को छानकर निकाल लिया जाता है। लगभग डेढ़ सौ ग्राम रस में इतना ही पानी मिलाकर भोजन के बाद और रात में सोने के पूर्व चार
काली मिर्च के चूर्ण तथा एक ग्राम सेंधा नमक के साथ पीते हैं। एक बार में लगभग ढाई सौ ग्राम की मात्रा पी जाती है। इसके पीने से पेट साफ हो जाता है और नुकसान दायी तत्व बाहर निकल जाते हैं एवं रक्त का संचरण सुचारु होने लगता है। इसके साथ ही अर्जुन छाल की चाय पीने और रोज दो पोथी लहसुन की चबाकर खाने से भी
लाभ होता है।
योग व प्राणायाम
आयुर्वेद में इलाज के साथ ही योग व प्राणायाम का सम्मिश्रण है। हृदय रोग के लिए सुखासन, पद्मासन व नाड़ी शोधन प्राणायाम लाभदायक हैं। इसमें भोजन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। हृदय रोगी के लिए अपच्य, गरिष्ठ, चिकनई युक्त
भोजन व सूखे मेवे वसा युक्त पदार्थ निषिद्ध हैं। इसके साथ ही आंवला और गाय के दूध से बनी ताजी छांछ के
अलावा अन्य किसी भी तरह की खटाई नहीं खाना चाहिए।
आयुर्वेद में हर तरह के रोगों का
इलाज है। इसमें हृदय रोग को दूर करने की भी विधियां हैं जिसमें योग प्राणयाम, खानपान व अन्य विधियों से हृदय की धमनियों में आई रुकावटों को दूर किया जाता है। इसमें कुछ समय
लगता है जिसके चलते रोगी बायपास सर्जरी के लिए भागता है जबकि आयुर्वेद का इलाज ज्यादा सस्ता और प्रभावी है।
डॉ.प्रदीप शुक्ला (प्रदेशाध्यक्ष)
आयुर्वेदिक चिकित्सक संघ