
खत्म हो रहीं प्राकृतिक अन्नपूर्णाएं
आने वाला समय भुखमरी का दौर होगा। देश दुनिया को सत्तासी फीसदी भोजन देने वालीं अन्नपूर्णाएं तितलियां व मधुमक्खियां लगातार खत्म होती जा रहीं हैं। वर्ष दर वर्ष बढ़ता ताप, हवा व पानी में घुलता उद्योगों से निकलने वाला जहर, व फसलों पर डाले जाने वाले कीटनाशक इन नन्हें लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण जीवों पर भारी पड़ रहे हैं। इनकी संख्या आधी से भी कम रह गई है। हर दूसरे उंचे पेड़ पर बड़ी संख्या में लगने वाले मधुमक्यिों के छत्ते और घर से लेकर खेतों तक मंडराने वाली तितलियां प्राय: कम ही नजर आते हैं। न तो ऊंचे पेड़ बचे हैं और न ही वह मौसम रह गया है जिसमें तितलियां मंडरा सकें। शोधों के मुतबिक देश में पाई जाने वाली कुल मधुमक्यिों व तितलियों में से अब मात्र ४३ फीसदी ही बची हैं। छत्तीसगढ़ कुछ खुश किस्मत है कि यहां देश के औसत से कुछ बेहतर स्थिति है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक पुरस्कार प्राप्त माईक पांडे के अनुसार स्थिति बेहद चिंताजनक है, यदि अब भी शांत बैठे रहे तो भूखों मरने का समय ज्यादा दूर नहीं हैं। उन्होंने बताया कि पहले दुनिया में दो से तीन वर्षों का खाद्दान्न उपलब्ध रहता था लेकिन अब मात्र नब्बे दिनों का खाद्दान है यदि किसी वर्ष अनाज उत्पादन के प्रमुख देशों में अकाल की स्थिति बनी तो खाने के लाले पड़ जाएंगे। श्री पांडे के अनुसार फसलों में बीज व फल आने केे लिए तितलियां व मधुमक्खिां बेहद जरूरी हैं। तितलियां, मधुमक्खिां ८७ फीसदी व चिडिय़ां १३ फीसदी परागण करतीं है तभी अनाज पैदा होता है। यदि यह खत्म हो जाएंगी तो अनाज व फलों का उत्पादन स्वत: समाप्त हो जाएगा। इनके बिना सहयोग के परागण संभव नहीं है और बिना परागण के फसलों में बीज पड़ ही नहीं सकते हैं।
अर्थ मैटर्स के छत्तीसगढ़ प्रभारी व पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार ईको वरियस ०८ से पुरस्कृत कोमल पारिख के अनुसार चीन में मधुमक्खियों के लगातार खत्म होने से आपातकाल की स्थिति है। पेड़ों में फल व फसलों में बीज नहीं आ रहे है। किसान पेड़ों पर चढ़कर मुर्गियों के पंखों से फूलों को हिलाते हैं जिससे परागण हो सके और फल आ सकें। केलीफोर्निया में स्थित ६०० वर्ग किलोमीटर के फार्म में लगे बादाम के पेड़ों में फल नहीं आ रहे हैं। इसी तरह हमारे यहां भी फसलों व पेड़ों में फलन लगातार कमी दर्ज की जा रही है। इन सबका एक मात्र कारण मधुमक्खियों व तित्लियों का कम या खत्म हो जाना है। ताप बढऩे से होता तनावप्राणि विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अशोक पांडे के अनुसार तितली और मधुमक्खी के लिए अनुकूल तापमान २५ से २७ अंश सेंटीग्रेट होता है। ज्यादा और कम होने पर उन्हें तनाव होता है। जिससे उनका जीवन चक्र प्रभावित होता है। उनका जीवन, प्रजनन आदि सबकुछ प्रभावित होता है। प्रदूषण, बढ़ता तापक्रम आदि इन्हें प्राण घातक साबित होता है।

