देश-प्रदेश में चलाए जा रहे नक्सली आंदोलन का खामियाजा यदि किसी ने भुगता है तो वह आदिवासी और गरीब आवाम हैं। इस पूरे खेल में एक तरफ आदिवासी और गरीबों के कथित हितैशी और दूसरी ओर जनता द्वारा जनता के लिए चुनी जाने वालीं सरकारें हैं। हितैशी ओर सरकारी तंत्र दोनों ही आम आवाम के हित के लिए कार्य करने का दावा करते हैं लेकिन सर्वाधिक नुकसान उसी आवाम का हो रहा है। दोंनों ओर मरने वाले आदिवासी ही हैं। इस खूनी खेल में चलने वाली अधिकांश गोलियां आम आदमी के सीने को छलनी करती हैं जिसका कोई कुसूर नहीं है। इस आम आवाम में एक ओर वे सिपाही होते हैं जो अपने माता-पिता के अरमानों को पूरा करने और देश सेवा करने के लिए पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों में जीतोड़ मेहनत कर भर्ती होते हैं। दूसरी ओर आम आवाम के वे लोग होते हैं जिन्हें गरीबी का भय और अमीर होकर समानता का दिवा स्वपन दिखाकर पूज्य पेड़ों, बड़ेे देव व माता-पिता की शपथ दिलाकर बिना उनकी इच्छा के हथियार पकड़ा कर सुरक्षा प्रहरियों के समक्ष खड़ा कर दिया जाता है। जब एक बार कोई सुरक्षा एजेंसियों या उनके दूसरी ओर हथियार लेकर खड़ा हो जाता है तो उसके समक्ष सिवाय आगे बढऩे के कोई चारा नहीं रह जाता है। आगे बढऩा उसकी मजबूरी हो जाती है। मौत को सामने महसूस करने के बावजूद दोंनो ही आगे बढ़ते हैं क्योंकि दोनों को ही मां की कसम धरती मां की खातिर दिलाई जाती है और दोंनों को ही मां अपनी जान से प्यारी होती है। दोंनों की मां एक होने के बावजूद कुछ कू्रर शातिर अलग अलग मां होने का भ्रम रचकर आपस में लड़ाने में सफल हो जाते हैं। एक देश के सविंधान के अनुसार मां की खातिर लड़ता है तो दूसरा अपने सविंधान के अनुसार मां की खातिर जान जोखिम में डालता है। दोंनो ही आपस में एक ही मां की खातिर लड़ जाते हैं जिसका अंजाम यह होता है कि जीते कोई छलनी मां का सीना ही होता है। मरना मां के एक बेटे को ही पडऩा पड़ता है। पश्चिम बंगाल के नक्शलवाड़ी से प्रारंभ हुए इस कथित आंदोलन का स्वरूप के सााि ही लक्ष्य भी बदल गए हैं। आदिवासी और गरीबों की खातिर होने वाली इस लड़ाई में आदिवासी ही सर्वाधिक मारे जा रहे हैं। अब तक अकेले प्रदेश में ही लगभग एक लाख आदिवासी या तो बेघर हो गए हैं या जिस माटी की खातिर लड़ाई प्रारम्भ की थी उससे बहुत दूर हो गए हैं। कैंपो में जीने को मजबूर इन आदिवासियों की परम्पराएं माटी में मिलती जा रही हैं। दोनो ओर आदिवासी ही मारे जा रहे हैं। जबकि दोंनों ओर लड़ाई कों संचालित करने वाले अपने महलों में सुरक्षित हैं। आदिवासियों की खातिर कथित आदिवासियों द्वारा चलाई जाने वाले खूनी खेल में खून भी आदिवासयों का ही बह रहा है। जबकि इसके पीछे सैकड़ों की तिजोरियां लबालब भर गईं हैं। इनमें सरकारी तंत्र के वे अधिकारी और नेता है जो नक्सलियों को रोकने के लिए आ रहे पैसे को अपनी तिजोरियों को भरने में लगा रहे हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र के वे बनिया भी शामिल हैं जो आदिवासी क्षेत्रों में दुकान खोलकर भोले भाले आदिवासियों को मुंहमागे दामों पर नमक तेल बेच रहे हैं। इनमें वे कथित आदिवासी हितैशी भी शामिल हैं जो नक्सली आंदोलन चलवाने के नाम पर कुछ नक्सल समर्थक सरकारों से पैसा ले रहे हैं। यह पूरा खेल आदिवासियों के हित में कहीं भी नहीं हैं। आदिवासियों के बीच ही कुछ ऐसे आदिवासी हो गए हैं जो गैरों के हाथ बिक गए हैं और भोले आदिवासियों की अशिक्षा का फायदा उठाकर उन्हें सविंधान के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं। आदिवासियों को चाहिए कि वे अपने बीच घुस आए गद्दार आदिवासियों को पहंचाने, एवं उनके नापाक इरादों को अंजाम तक न पहुंचने दें। सरकारी तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व में बैठे आदिवासियों को चाहिए कि वे आदिवासी हितों की योजनाओं को उन तक पहुंचाने में ईमानदारी का परिचय दें। वरना पिछले कई दशकों से साजिश के तहत संघर्ष में ङाोंका गया पूरा समाज ही समाप्त हो जाएगा और कथित आदिवासी हितैसियों के नापाक मंसूबे सफल हो जाएंगे।
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