बुधवार, 13 मई 2009

मंदी ने दिखाई भक्ति की राह

जब जब परिस्थतियां मानव समाज के सामने जटिलताएं पैदा करती हैं तब तब वह अध्यात्म के सहारे रास्ता ढूंढता रहा है। ऐसा ही कुछ मौजूदा मंदी के दौर में देखने को मिल रहा है। मंदी के प्रभाव से उपजने वाले तनाव को दूर करने के लिए आम व खास सभी भक्ति, भगवान, मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारा, अध्यात्म की ओर मुड़ रहे हैं। ज्योतिष को अवैज्ञानिक मानने वाले सूचना तकनीक के पैरोकार व उद्योगपति भी अब उसके सहारे अपने बेहतर समय को खोज रहे हैं। गृह-नक्षत्रों को अपने पक्ष में करने के उपाय किए जा रहे हैं। ज्योतिषों व पंडितों की पूंछ परख लगातार बढ़ रही है।
विश्वव्यापी मंदी ने कृषि प्रधान होने के बावजूद कुछ हद तक ही सही देश-प्रदेश को अपनी चपेट में लिया है विशेषकर शहरी वर्ग और उद्योगों से जुड़े लोगों को मंदी की सुरसा प्रभावित कर रही है। लगभग सभी प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। यहां तक की व्यवसायिक पाठ्यक्रमों प्रबंधन, सूचना तकनीक, इंजीनियरिंग, पत्रकारिता आदि में अध्यनरत युवा भी गहरे तनाव में हैं। इस तनाव को दूर करने के लिए वे सब मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारों का सहारा ले रहे हैं। इन दिनों कर्म पर भरोसा करने वाले युवा भी कर्म के साथ मन को शांत रखने के लिए भक्ति का सहारा ले रहे हैं। यदि हम कुछ वर्षों पूर्व में जाएं तो युवाओं के साथ ही आम आदमी कर्मवादी हो चला था, उसे अपनी शिक्षा और योग्यता पर पूरा भरोसा था, वह मंदिर-मस्जिदों या भक्ति से थोड़ा सा दूर होता नजर आ रहा था। अभिभावक भी बच्चों के व्यवहार से ज्यादा चिंतित नहीं थे क्योंकि चारो तरफ शिक्षित होने वालों को मोटे वेतन की नौकरियां मिल रहीं थी। अध्यात्म का योगदान नजर नहीं आ रहा था। लेकिन जब से मंदी ने देश में कुछ हद तक और विदेश में बड़े पैमाने पर असर दिखाया तो सभी को परमपिता की याद आई और विभिन्न रूपों में उन्हें याद किया जाने लगा है। पूजा आराधना स्थलों पर जाने वालों की संख्या में एकाएक वृद्धि हो रही है। लोग पंडित-मौलवियों से शांति की राह पूछ रहे हैं। मंदिरों में दोनो वक्त दर्शनार्थी पहुंच रहे हैं तो पांच वक्त अजान करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। बाबा रामदेव के योग शिविरों, पं.श्री रविशंकर के निर्देशन में चलने वाले आर्ट आफ लिविंग की कक्षाओं में पहुंचने वाले अब पहले से ज्यादा हो गए हैं।
बढ़ा है ज्योतिष पर भरोसा
मंदी ने बड़े-बड़ों को पानी पिलवा दिया है। देश भर में ज्योतिषीय परामर्श देने वाले मुकेश जैन बताते हैं कि मंदी के बाद से उनके पास परामर्श लेने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। ज्यादातर उद्योगपति व युवा, महिलाएं आदि उनके पास जाकर परामर्श ले रहे हैं एवं बताए गए उपायों को पूरी श्रद्धा के साथ अपना रहे हैं। श्री जैन के अनुसार लोगों में ज्योतिष के प्रति विस्वास और मजबूत हुआ है।
बढ़ी नक्षत्रों के नगों की वृद्धि
मालवीय सड़क पर स्थित सुमित ज्वेलर्स के संचालक अशोक काकडिय़ा बताते हैं कि मंदी के बाद खरीददारों की संख्या तो घटी लेकिन नक्षत्रों संबंधी नगों हीरा, मोती, गोमेद, पुखराज, माणिक्य आदि खरीदने वालों की संख्या बढ़ी है।
अध्यात्म ही दिलाएगा शांति
पं.मोहन मुरारी के अनुसार मंदी से उपजे तनाव से शांति केवल अध्यात्म ही दिला सकता है क्योकि यही वह मार्ग है जो थोड़े में संतोष करने की सीख देता है और कर्म करने के बाद कर्मफल परमपिता पर छोडऩे के लिए कहता है। उनके अनुसार लोग पूजा आराधना संबंधी परामर्श बड़ी संख्या में आ रहे हैं। विशेषकर शहरी वर्ग में मंदी ने एक बार फिर भक्ति की अलख को मजबूत कर दिया है।

मंदी से पुनर्जीवित हुआ कार्ल मार्क्स

वर्तमान विश्वव्यापी आर्थिक संकट ने छोटे-बड़े सभी देशों की कमर तोडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सरकारें और उद्योगपति इससे बचने के उपाय तो कर रहे हैं लेकिन, नतीजा सिफर रहे। इस संकट की घड़ी में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के धुर विरोधी कार्लमाक्र्स को एक बार फिर याद किया जा रहा है। उनकी पुस्तकों में मंदी का इलाज ढूंढ़ा जा रहा है।
लोग नेट से लेकर बाजार तक माक्र्स के साहित्य को खंगालने में लगे हुए हैं। लगता है कि पूंजीवाद के हिमायतियों को चिढ़ाने के लिए माक्र्स इतिहास के मलबे से बाहर निकल आया हो। कुछ दिनों पहले जर्मनी के वित्तमंत्री पीयर ने यह कहकर सभी को हैरत में डाल दिया किवर्तमान समस्याओं को हल करने के लिए माक्र्स के सुङााए रास्ते पर चलना गलत न होगा। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी भी उनकी लिखित पुस्तक दास कैपिटल को पढ़ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, एक जर्मन फिल्मकार एलेक्जेंडर क्लूग ने तो दास कैपिटल पर एक फिल्म बनाने की भी घोषणा कर दी है। अर्थशास्त्री बताते हैं कि माक्र्स पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था को समाज के लिए अहितकर मानते थे। उनका मानना था कि जब तक आम आदमी की आय नहीं बढ़ेगी तब तक समाज सुखी नहीं होगा और न ही अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। लालची अमेरिकी बैंकरों ने बोनस कमाने की होड़ में घरों को गिरवी रखकर लोगों को कर्ज देने का सिलसिला शुरू किया और इन कर्जों की ऊंची क्रेडिट रेटिंग करवा कर उनके आधार पर बनाए गए बॉण्ड और प्रतिभूतियां सारी दुनिया को बेचकर बेवकूफ बनाने की कोशिश की, उसकी परिकल्पना माक्र्स ने वस्तुओं को व्यापार करने योग्य संपदा में परिवर्तित करने की बात कह कर की थी।
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माक्र्स के सिद्धांतों में मंदी से बचने के उपाय हैं। उनके अनुसार, पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपति श्रमिकों को
केवल जीवनयापन लायक पैसा देते हैं। इससे आम आदमी के पास खरीदारी के लायक पैसा नही होता। एक समय बाद उत्पादन अधिक और उसके खरीदार कम हो जाते हैं और मंदी आ जाती है। यदि काम करने वालों को भरपूर पैसा दिया जाए तो वे उसे बाजार में खर्च करेंगे और उत्पादन खपता जाएगा। बेहतर मजदूरी ही मंदी को उत्पन्न ही नहीं होने देगी।
व्याख्याता बीएल सोनेकर
प. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
माक्र्स का घोषणा पत्र
पिछले साल जो विश्वव्यापी संकट अमेरिका से शुरू हुआ, उसकी कल्पना माक्र्स ने १६० साल पहले ही कर ली थी। वर्ष १८४८ में फ्रेडरिक एंजेल्स के साथ मिलकर उन्होंने जो कम्युनिस्ट घोषणापत्र तैयार किया था, उसमें खींची दुनिया की आर्थिक संकट की तस्वीर आज से काफी मिलती है।
घोषणा में कहा गया था कि आधुनिक बुर्जुआ समाज एक जादूगर की तरह है... उसने उत्पादन और विनिमय के इतने दैत्याकार साधन खड़े कर लिए हैं,..जिनकी वजह से मालिकों का मुनाफा दिन-रात बढ़ता जा रहा है और मजदूर लगातार गरीबी के गर्त में गिरते जा रहे हैं... आए दिन जो आर्थिक संकट पैदा होते रहते हैं, उनसे बुर्जुआ वर्ग के अस्तित्व और सत्ता को खतरा पैदा हो गया है... इन संकटों के दौरान अत्यधिक उत्पादन की ऐसी महामारी चारों तरफ फैलने लगती है,...अचानक समाज अपने आपको आर्थिक बर्बरता के बीच फंसा महसूस करने लगता है और ऐसा महसूस होने लगता है मानो किसी अकाल या सार्वभौमिक विनाशकारी युद्ध ने हमारे अस्तित्व के
लिए जरूरी समस्त साधनों को हमसे छीन लिया है। तब ऐसा लगता है जैसे सारे उद्योगों और व्यापार का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है... लेकिन ऐसा
होता क्यों है? इसका एकमात्र कारण यह है कि हम जीवन के असीम साधनों, उद्योगों और व्यापार को इतना अधिक बढ़ा देते हैं कि वह किसी राक्षस की
तरह हमें ही निगल जाने के लिए अपना मुंह खोलने लगता है। और इस प्रकार जिन चीजों का विस्तार बुर्जुआ समाज ने अपने आपको मजबूत बनाने के लिए किया था, वे ही उसकी दुश्मन बन जाती हैं।

गेरू करती थी खाद्यान की सुरक्षा

आधुनिक समय में तरह-तरह के कीटनाशक बाजार में आकर बेअसर साबित हो रहे हैं। अनाज तो नहीं बच रहे उलट किसान इन महंगे कीटनाशकों से लुटने पर मजबूर हैं। लेकिन ईशा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी शातवाहन काल में किसानों के पास बेहद प्रभावी और आसानी से उपलब्ध कीटनाशक गेरु था जिससे वे अपने अनाज की सुरक्षा करते थे। ऐसे प्रमाण सिरपुर की खुदाई में मिले हैं। यहां मिले अनाज भंडारों में गेरु के टुकड़े पाए गए हैं।
सिरपुर में पुरातात्विक सलाहकार अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में चल रही खुदाई हर दूसरे रोज जमीन में दफन नए नए राज उगल रही है जिनसे उसकाल की समृद्ध सभ्यता और संस्कृति की जानकारी तो मिलती ही है। साथ ही उस समय की कृषि और उससे संबधित अन्य राज भी सामने आ रहे हैं जो आज भी कारगर हो सकते हैं। हाल ही में यहां आयुर्वेदिक कुंड, अनाज भंडार व वैदिक पाठशाला के अवशेष मिले हैं। इनमें से आयुर्वेदिक कुंड व अनाज भंडार शतवाहन काल ईसा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी के हैं जबकि वैदिक पाठशाला शरभपूर्या काल पांचवी-छटवीं शताब्दी की हैं। खुदाई के दौरान नगर संरचना में पत्थर से बने लंबे भूमिगत कमरों के अवशेष मिले हैं। इन्हें ढंकने की भी पुख्ता व्यवस्था की गई है। यह कमरे उस काल के अनाज भंडार माने जा रहे हैं। कमरों में गेरु के टुकड़े भी हैं जो उस काल में अनाज की सुरक्षा के उपायो की ओर इशारा करते हैं। आयुर्वेदिक कुंड के पास होने और इनके पत्थरों से बने होने के कारण इनमें चूहे तो पहुंचते ही न होंगे,अनाज को दीमक , घुन या अन्य इसी तरह के अन्य कीटों से सुरक्षा के लिए इनमें गेरु डाली जाती थी। गेरु के टुकड़े भूमिगत कमरों से प्राप्त हुए हैं।
आयुर्वेदिक कुंड में मिटते थे चर्मरोग
खुदाई में नगर सरंचना के तहत ३.६० मीटर के पत्थर कुंड मिले हैं। कुंड के पास ही तुलसीचौरा है। जिसका पानी एक भूमिगत नाली के माध्यम से कुंड में जाने की व्यवस्था है। साथ ही कुंड से एक भूमिगत नाली जल निकासी है। इनकी संरचना बताती है कि इन कुंडो के पानी का उपयोग विभिन्न चर्मरोंगों को ठीक करने के लिए किया जाता रहा होगा। इसमें तुलसीचौरा में लगी तुलसी को जल अर्पित करने पर पानी पत्तियों, शाखाओं और जड़ों से होकर कुंड में पहुंचता होगा। जो चर्मरोंगों को ठीक करने में कारगर होता है। संभवना है कि इसमें कुछ अन्य पत्तियां जैंसे नीम आदि को डाला जाता रहा होगा। इसे विभिन्न तरह के आयुर्वेदिक लेपों से होने वाली चिकित्सा से जोड़कर देखा जा रहा है।
तालाबों के बीच होती रही पढ़ाई
शरभपूर्या काल में सिरपुर के छात्र आठ तालाबों के बीच बनी वैदिक पाठशाला में वेदों का अध्यन करते थे। यहां रामकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर डेढ़ मीटर चौडें व दस मीटर लंबे बरामदे मिले हैं। इनके बीचों बीच स्थापित भगवान श्री विष्णु की १.१० मीटर की प्रतिमा इसके पाठशाला होने की ओर संकेत करती है। माना जाता है कि इस काल में वेदों के विरुद्ध मूर्तिपूजा चरम पर थी और पाठशालाओं में मूर्ति स्थापित कर उनके समक्ष ही विद्याअध्यन किया जाता था। पाठशाला रायकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर है। इसके पास ही आचार्यों के कमरे हैं। चारों ओर आठ तालाब हैं जिनमें आज भी कमल खिलते हैं।
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सिरपुर उत्खनन में नगर संरचना के बीच सार्वजनिक मकान में पत्थर के कुंड, निजी मकान में भूमिगत कमरे व रायकेरा तालाब के पूर्व में बरामदे मिले हैं। जिनमें से सार्वजनिक मकान में मिला कुंड आयुर्वेदिक कुंड की तरह है। यहां प्राप्त अनाज भंडार में गेरु के टुकड़े उस काल में कीटों से अनाज की सुरक्षा के उपायों को बताते हैं। साथ ही बरामदे की लंबाई चौड़ाई और उसके बीचों बीच स्थापित विष्णु की प्रतिमा शरभपूर्या काल की वैदिक पाठशाला की ओर इशारा करती है।
अरुण कुमार शर्मा
पुरातात्विक सलाहकार मानक
निदेशक सिरपुर खुदाई छत्तीसगढ़ शासन