सोमवार, 18 मई 2009

पेट्रोल पम्प कर्मियों के लिए पेट्रोल खतरनाक

मौजूदा दौर में पेट्रोल हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया हैं। शहर की तो छोड़े, गांव वाले भी इसके इतने आदि हो चुके है कि इसके बिना दो कदम चल नहीं सकते। लेकिन हम में से बहुत कम लोगों को पता होगा कि आम आदमी तक पेट्रोल पहुंचाने वालों को यह बेहद घातक साबित होता हैं। जब हम पेट्रोल पंप पर जाते है तो जो चेहरे हंसते-मुस्कुराते हमारा स्वागत कर पेट्रोल देते हैं उनके लिए पेट्रोल पंपों पर लगातार काम करना स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत खतरनाक होता हैं, वे अंदर से खोखला होते जाते हैं। २४ घंटे पेट्रोल की गंध उसके शरीर में बनी रहती है यह गंध हवा के द्वारा उनके सांसों के साथ फेफड़े में जाती है जो समूचे शरीर तंत्र को कमजोर बना देती हैं।
गंध से नशा होता और नशे से बीमारी
डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर अस्पताल के अधीक्षक एमडी डॉ. जी.बी. गुप्ता का कहना हैं कि पेट्रोल के वाष्पीकरण के बाद उसमें से गंध आती है जो सीधे फेफड़े तक जाकर शरीर में एक अजीब सा नशा की स्थिति पैदा करती है। यहीं नशा आगे जाकर ब्रॉकाइट्स जैसे घातक बीमारियों का कारण बन सकती है
औद्योगिक विष अनुशंधान कें्र लखनऊ के एक शोध के निष्कर्ष भयावह हैं। इनमें बताया गया है कि पेट्रोल पंप पर नंगे हाथों काम करने वालों को कई त्वचा संबंधी बीमरियों का भी सामना करना पड़ सकता हैं। शोध कहते है कि पोट्रल पंप पर काम करने वालों और गैराज में पेट्रोल वाहनों की मरम्मत करने वालों के रक्त मूत्र में सीसे (लेड) की मात्रा पाई गई है जो लीवर व गुर्दे को खराब करती हैं। इससे व एनीमिया, हृदय रोग और बेहरेपन का भी शिकार हो सकते हैं।
बचाव ही बेहतर है
डॉ. गुप्ता के अनुसार बचाव ही इसके बेहतर उपाय होते हैं। इसके लिए पूरे शरीर को ढ़कने से ऐपे्रन से ढ़के एवं हाथों में ग्लोब का इस्तेमाल करें। हमारे यहां एप्रेन तो पहन लेते है जबकि ग्लोब का इस्तेमाल कोई नहीं करता। लगातार पेट्रोल के संपर्क में न रहे। नौकरी को बदल-बदल कर करते रहना चाहिए।

पानी मे घुल रहा जहर

पानी जीवन का आधार है और ज्यादातर बीमारियों की जड़ दूषित पानी होता है। उसमें मौजूद तत्वों में बदलाव आम आदमी के स्वास्थ्य पर तुरंत असर डालते हैं। निर्धारित मात्रा के उपर नीचे होते ही स्वास्थ्य डगमगाने लगता है। इनमें मौजूद नाइट्रेट, लोहा, सल्फेट आर्सेनिक आदि तत्वों के बढ़ते ही स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालते हैं। जल के तत्वों की मात्रा में खतरनाक बदलाव आ रहे हैं। लगातार दोहन और रासायनिक खादों के अधाधुंध प्रयोग साथ ही उद्योगों से होने वाले प्रदूषण से पानी में हानिकारक रसायनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही एक बड़ा भाग प्लास्टिक और सीमेंट से ढंकने के कारण वर्षा जल भूमि में नहीं जा पा रहा जिसे पानी के इन बदलावों को जिम्मेदार माना जा रहा है।
प्रकृति द्वारा मुफ्त में मिलने वाला पानी भी शुद्ध नहीं रहा। पानी में आर्सेनिक, फ्लोराईड, लोहा, नाईट्रेट आदि की मात्रा स्वास्थ्य को दुष्प्रावित करने वाली स्थिति में पहुंच गई है।
कें्रीय भूजल बोर्ड के शोंधों के आधार पर जारी रिर्पोट में प्रदेश के अनेक क्षेत्रों के पानी में मौजूद तत्वों में खतरनाक स्तर तक बढ़ोत्तरी हुई है। इन में त्वचा कैंसर के लिए जिम्मेदार आर्सेनिक, सल्फेट, दांत के रोंगो का कारण फलोराईड व नाइट्रेट आदि शामिल हैं।
शुद्ध पानी में सल्फेट का मानक स्तर चार मिलीग्राम प्रति लीटर है फ्लोराईड की अधिक मात्रा दातों सहित हड्डी संबंधी परोशानियों को जन्म देती है। इसका मानक स्तर १.५ पीपीएम है। शरीर के लिए बेहद घातक एवं त्वचा रोगों का कारण आर्सेनिक तो कई गुना बढ़ा हुआ है। इसका मानक स्तर ०.५ मिलीग्राम प्रति लीटर है।
लगातार गिर रहा भूजल स्तर
केन्द्रीय भूजल बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। यह भूजल स्तर ४ से ७ मीटर तक नीचे जा चुका है, बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, कम वर्षा और जमीन पर हो रहे निर्माण कार्यों खासकर जमीन को सीमेंट से घेरने कारण यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, इसकी वजह से भूजल का पुनर्चक्रीकरण और पुनर्भरण नहीं हो पाता है।इसके अनुसार ७३ प्रतिशत से अधिक कुओं का जलस्तर कई मीटर तक गिर चुका है