बुधवार, 27 मई 2009

गेरू करती थी खाद्यान की सुरक्षा

आधुनिक समय में तरह-तरह के कीटनाशक बाजार में आकर बेअसर साबित हो रहे हैं। अनाज तो नहीं बच रहे उलट किसान इन महंगे कीटनाशकों से लुटने पर मजबूर हैं। लेकिन ईशा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी शातवाहन काल में किसानों के पास बेहद प्रभावी और आसानी से उपलब्ध कीटनाशक गेरु था जिससे वे अपने अनाज की सुरक्षा करते थे। ऐसे प्रमाण सिरपुर की खुदाई में मिले हैं। यहां मिले अनाज भंडारों में गेरु के टुकड़े पाए गए हैं।
सिरपुर में पुरातात्विक सलाहकार अरुणकुमार शर्मा के निर्देशन में चल रही खुदाई हर दूसरे रोज जमीन में दफन नए नए राज उगल रही है जिनसे उसकाल की समृद्ध सभ्यता और संस्कृति की जानकारी तो मिलती ही है। साथ ही उस समय की कृषि और उससे संबधित अन्य राज भी सामने आ रहे हैं जो आज भी कारगर हो सकते हैं। हाल ही में यहां आयुर्वेदिक कुंड, अनाज भंडार व वैदिक पाठशाला के अवशेष मिले हैं। इनमें से आयुर्वेदिक कुंड व अनाज भंडार शतवाहन काल ईसा पूर्व दूसरी-चौथी शताब्दी के हैं जबकि वैदिक पाठशाला शरभपूर्या काल पांचवी-छटवीं शताब्दी की हैं। खुदाई के दौरान नगर संरचना में पत्थर से बने लंबे भूमिगत कमरों के अवशेष मिले हैं। इन्हें ढंकने की भी पुख्ता व्यवस्था की गई है। यह कमरे उस काल के अनाज भंडार माने जा रहे हैं। कमरों में गेरु के टुकड़े भी हैं जो उस काल में अनाज की सुरक्षा के उपायो की ओर इशारा करते हैं। आयुर्वेदिक कुंड के पास होने और इनके पत्थरों से बने होने के कारण इनमें चूहे तो पहुंचते ही न होंगे,अनाज को दीमक , घुन या अन्य इसी तरह के अन्य कीटों से सुरक्षा के लिए इनमें गेरु डाली जाती थी। गेरु के टुकड़े भूमिगत कमरों से प्राप्त हुए हैं।
आयुर्वेदिक कुंड में मिटते थे चर्मरोग
खुदाई में नगर सरंचना के तहत ३.६० मीटर के पत्थर कुंड मिले हैं। कुंड के पास ही तुलसीचौरा है। जिसका पानी एक भूमिगत नाली के माध्यम से कुंड में जाने की व्यवस्था है। साथ ही कुंड से एक भूमिगत नाली जल निकासी है। इनकी संरचना बताती है कि इन कुंडो के पानी का उपयोग विभिन्न चर्मरोंगों को ठीक करने के लिए किया जाता रहा होगा। इसमें तुलसीचौरा में लगी तुलसी को जल अर्पित करने पर पानी पत्तियों, शाखाओं और जड़ों से होकर कुंड में पहुंचता होगा। जो चर्मरोंगों को ठीक करने में कारगर होता है। संभवना है कि इसमें कुछ अन्य पत्तियां जैंसे नीम आदि को डाला जाता रहा होगा। इसे विभिन्न तरह के आयुर्वेदिक लेपों से होने वाली चिकित्सा से जोड़कर देखा जा रहा है।
तालाबों के बीच होती रही पढ़ाई
शरभपूर्या काल में सिरपुर के छात्र आठ तालाबों के बीच बनी वैदिक पाठशाला में वेदों का अध्यन करते थे। यहां रामकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर डेढ़ मीटर चौडें व दस मीटर लंबे बरामदे मिले हैं। इनके बीचों बीच स्थापित भगवान श्री विष्णु की १.१० मीटर की प्रतिमा इसके पाठशाला होने की ओर संकेत करती है। माना जाता है कि इस काल में वेदों के विरुद्ध मूर्तिपूजा चरम पर थी और पाठशालाओं में मूर्ति स्थापित कर उनके समक्ष ही विद्याअध्यन किया जाता था। पाठशाला रायकेरा तालाब के पूर्व में सबसे उंचे स्थान पर है। इसके पास ही आचार्यों के कमरे हैं। चारों ओर आठ तालाब हैं जिनमें आज भी कमल खिलते हैं।
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सिरपुर उत्खनन में नगर संरचना के बीच सार्वजनिक मकान में पत्थर के कुंड, निजी मकान में भूमिगत कमरे व रायकेरा तालाब के पूर्व में बरामदे मिले हैं। जिनमें से सार्वजनिक मकान में मिला कुंड आयुर्वेदिक कुंड की तरह है। यहां प्राप्त अनाज भंडार में गेरु के टुकड़े उस काल में कीटों से अनाज की सुरक्षा के उपायों को बताते हैं। साथ ही बरामदे की लंबाई चौड़ाई और उसके बीचों बीच स्थापित विष्णु की प्रतिमा शरभपूर्या काल की वैदिक पाठशाला की ओर इशारा करती है।
अरुण कुमार शर्मा
पुरातात्विक सलाहकार मानक
निदेशक सिरपुर खुदाई छत्तीसगढ़ शासन

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