सोमवार, 11 मई 2009

नशेब नही होते चार कंधे

आम आदमी की तमन्ना होती है कि शांति पूर्वक जीवन के बाद उसकी अंतिम यात्रा चार कंधो पर हो, लेकिन बढ़ती आपाधापी और संवेदन शून्य होते समाज में अब अंतिम यात्रा के लिए चार कंधे भी नसीब नहीं होते हैं। इस तरह के उदाहरण शहर में हर रोज देखने को मिल जाते हैं। अंतिम संस्कार में शामिल होने अब आवश्यक संख्या में लोग नहीं पहुंचते और शव चार कंधो के स्थान पर किराए की गाड़ी पर ले जाया जाता है।
शहर में देवेन््र नगर स्थित मुक्तिधाम, महादेव घाट व मारवाड़ी शमसान घाट सहित छोटे बड़े लगभग आधा दर्जन से शमसान घाट हैं। इनमें लगभग हर रोज अंतिम संस्कार होता है। जहां पहुंचने वाली शवयात्रा में बदलाव स्पष्ठ देखे जा सकते हैं। शमसान घाट पहुंचने वाली मृत देह अब चार कंधों पर नहीं बल्कि चार पहियों पर पहुंचती है। यह मृत व्यक्ति की अंतिम इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं वरन मजबूरी वश होता है। क्योंकि मौत पर अब पड़ोसी भी नहीं पहुंचते,पुण्य का काम माने जाने वाले अंतिम संस्कार में नफा नुकसान को आंका जाने लगा है। मृतक कोई उद्योगपति, राजनेता या अन्य इसी प्रकार का बड़ा नाम होता है तो उनकी शवयात्रा में जाने वालों और उनके घर पहुंच कर मगरमच्छ के आंसू बहाने वालों की भीड़ लगी रहती है। आम आदमी हुआ तो उसके यहां पहुंचने वाले नजदीकी रिस्तेदार ही होते हैं। जिनके पास थोड़ी बहुत संवेदनां होती है वे भी गाडिय़ों से सीधे शमसान घाट पहुंचते हैं और वहां भी वे अपने धंधे की या अन्य तरह की बातों में मशगूल रहते हैं। राजधानी में शमसान घाट तक शव ले जाने वाली गाडिय़ों की संख्या लगातार इजाफा हो रहा है। इसके बावजूद मृतक के परिजनों के लिए अंतिम संस्कार के लिए कई घंटे तक इंतजार करना पड़ता है क्योंकि यह गाडिय़ां इतनी व्यस्त होती है कि उनके संचालकों को एक ही समय पर चार पांच स्थानों से एक साथ इन गाडिय़ों के बुलावे की सूचना आती है। जो इस बात का प्रमाण हैं कि चार कंधे मिलना भी अब बीती बात होने वाली है। इस संबंध में समाज सेवी अनिल गुरुवक्षाणी कहते हैं कि मौजूदा समय में सवेंदन शून्यता तो निश्चित बढ़ी है। आम आदमी के पास समय की कमी और दूर-दूर शमसान घाट होने के कारण लोग पैदल जाने की अपेक्षा गाड़ी से जाना पसंद करते हैं। यह जरूरी तो नहीं लेकिन आपाधापी की जिंदगी में कम पड़ते समय में आवश्यता सी बन गई है।
ह्यह्यशहर में शमसान घाट तक शव ले जाने वाले तीन वाहन हैं जिन्हें स्वर्ग रथ कहा जाता है। इनमें से एक मारवाड़ी युवा मंच के पास है जब कि दो बढ़ते कदम संस्था संचालित कर रही है। इनकी मांग दिन ब दिन बढ़़ रही है। कभी कभी तो एसा समय आता है जब एक ही समय में तीन चार स्थानों से एक साथ बुलावा आ जाता है। इसका बड़ा कारण लोगों के बीच बढ़ती दूरियां हैं। कभी कभी तो यह भी देखने को मिलता है कि शव गाड़ी के इंतजार में रखा रहता है जब तक गाड़ी नहीं पहुंचती तब तक अंतिम यात्रा नहीं निकल पाती है।
इं्रकुमार डोडवाणी(अध्यक्ष)
समाज सेवी संस्था बढ़ते कदम

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