सोमवार, 11 मई 2009

गीता के आधार पर गढ़ रही जातियां

इसे समय की mang कहें या अर्थसत्ता का प्रभाव कि जातियों के बंधन टूट रहे हैं। इसके साथ ही व्यवसाय के पारम्परिक बंधन भी
शिथिल हो गए हैं। ब्राम्हण वर्ण में पैदा होने वाले व्यक्ति धार्मिक कर्मकाण्ड छोड़ अन्य कार्यों में संग्लग्र हो गए हैं, वहीं कल तक अछूत माने जाने वाले और कर्मकाण्ड से दूर रहने वाले वर्ण के लोग धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पन्न कराने लगे हैं। उनके मुख से निकलने वाले संस्कृत के श्लोक सुखद अहसास
कराते हैं। इस परिवर्तन में
श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित वर्ण व्यवस्था नए सिरे से बनती नजर आ रही है। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि 'चातुर्वण्य मया सृष्टं गुणकर्म
विभागश:ज् अर्थात चार वर्णों का निर्माण मुङा परमशक्ति के द्वारा गुण कर्म के आधार पर किया गया है। मौजूदा समय में इसी गुण कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था परमशक्ति का एक स्वरूप कुदरती आधार पर निर्मित हो रही है। कल तक विभिन्न समारोहों में बैण्ड बजाने का कार्य एक विशेष जाति करती थी, लेकिन अब इस कार्य में अन्य
जातियों के लोग भी मिल जाते हैं। ब्राम्हण के लिए आरक्षित माने जाने वाले धार्मिक कर्मकांड को अब अन्य जातियों के लोग भी सम्पन्न करा रहे हैं। सुरक्षा के लिए नियत क्षत्रिय वर्ण के लोग वैश्य का कृषि कार्य करते मिल जाते हैं। सुरक्षा सेनाओं में ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र आदि सभी वर्णों के लोग मिलते हैं। शिक्षा देने भी में सभी जाति के लोग संलग्र हो चुके हैं। इसी तरह कल तक बाल काटने का कार्य केवल नाइयों के भरोसे होता था, लेकिन अब सवर्ण भी इस कार्य में शामिल हो रहे हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण बालों के विशेषज्ञ जावेद हबीब द्वारा संंचालित वे विद्यालय हैं जिनमें बालों को सजाने संवारने का प्रशिक्षण लेने सभी वर्णों के युवक पहुंच रहे हैं। आकार लेती इस नई वर्ण व्यवस्था को इस आधार पर और बल मिलता है कि यह व्यवसायिक कार्य उनके शादी सम्बन्धो में भी महत्वपूर्ण
भूमिका निभाने लगे हैं। एक
चिकित्सक या उसके बेटे की शादी चिकित्सक के ही परिवार में किया जाना Ÿोयस्कर माना जाता है। सैनिक परिवार शादी सम्बन्ध करते समय सैनिक परिवार ही देखता है। इसी तरह किसान चाहे वह किसी भी जाति का हो वह विवाह सम्बन्ध करते वक्त किसान परिवार ही ढूंढ़ता है। इसका बड़ा कारण विचार मिलने और भविष्य में किसी
तरह का टकराव न होने की सोच के चलते होता है। मौजूदा समय में किसान, व्यवसायी, उद्योगपति आदि वर्गों में सभी वर्णों के लोग मिलते हैं। इस सम्बन्ध में समाज शाष्त्र के प्रोफेसर प्रमोद शर्मा कहते हैं कि वर्ण आधारित पारपम्परिक व्यवसाय अब नहीं बचे हैं। आर्थिक सत्ता के मजबूत होने से जिसे जो भा रहा है व्यवसाय कर रहा है।
वर्षों से जन्म आधारित व्यवस्था टूट कर कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था बन रही है।
भौतिकवादी युग की आवश्यकता
दर्शन शाष्त्र के प्रोफेसर डॉ. भगवंत सिंह कहते हैं कि अर्थव्यवस्था और
भौतिकवादी युग के चलते यह आवश्यक हो गया है कि जिसे जो अच्छा लगे, वह व्यवसाय करे। क्योंकि मौजूदा समय अर्थ प्रधान हो गया है। ऐसे में वर्ण आधारित व्यवसायिक परम्पराएं टूट रही हैं और नए सिरे से समाज का व्यवस्थापन हो रहा है। इसे गीता के आधार पर समाज का पुनर्गठन कहा जा सकता है लेकिन यह प्राथमिक अवस्था ही है, एक लम्बे समय बाद
संभव है कि कर्म के आधार पर बने वर्ण पूर्ण रूप से सामने आए। यह गीता में वर्णित गुण कर्म के आधार पर निर्मित वर्ण व्यवस्था का पुनस्र्थापन है।

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