बुधवार, 13 मई 2009

मंदी से पुनर्जीवित हुआ कार्ल मार्क्स

वर्तमान विश्वव्यापी आर्थिक संकट ने छोटे-बड़े सभी देशों की कमर तोडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सरकारें और उद्योगपति इससे बचने के उपाय तो कर रहे हैं लेकिन, नतीजा सिफर रहे। इस संकट की घड़ी में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के धुर विरोधी कार्लमाक्र्स को एक बार फिर याद किया जा रहा है। उनकी पुस्तकों में मंदी का इलाज ढूंढ़ा जा रहा है।
लोग नेट से लेकर बाजार तक माक्र्स के साहित्य को खंगालने में लगे हुए हैं। लगता है कि पूंजीवाद के हिमायतियों को चिढ़ाने के लिए माक्र्स इतिहास के मलबे से बाहर निकल आया हो। कुछ दिनों पहले जर्मनी के वित्तमंत्री पीयर ने यह कहकर सभी को हैरत में डाल दिया किवर्तमान समस्याओं को हल करने के लिए माक्र्स के सुङााए रास्ते पर चलना गलत न होगा। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी भी उनकी लिखित पुस्तक दास कैपिटल को पढ़ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, एक जर्मन फिल्मकार एलेक्जेंडर क्लूग ने तो दास कैपिटल पर एक फिल्म बनाने की भी घोषणा कर दी है। अर्थशास्त्री बताते हैं कि माक्र्स पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था को समाज के लिए अहितकर मानते थे। उनका मानना था कि जब तक आम आदमी की आय नहीं बढ़ेगी तब तक समाज सुखी नहीं होगा और न ही अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। लालची अमेरिकी बैंकरों ने बोनस कमाने की होड़ में घरों को गिरवी रखकर लोगों को कर्ज देने का सिलसिला शुरू किया और इन कर्जों की ऊंची क्रेडिट रेटिंग करवा कर उनके आधार पर बनाए गए बॉण्ड और प्रतिभूतियां सारी दुनिया को बेचकर बेवकूफ बनाने की कोशिश की, उसकी परिकल्पना माक्र्स ने वस्तुओं को व्यापार करने योग्य संपदा में परिवर्तित करने की बात कह कर की थी।
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माक्र्स के सिद्धांतों में मंदी से बचने के उपाय हैं। उनके अनुसार, पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपति श्रमिकों को
केवल जीवनयापन लायक पैसा देते हैं। इससे आम आदमी के पास खरीदारी के लायक पैसा नही होता। एक समय बाद उत्पादन अधिक और उसके खरीदार कम हो जाते हैं और मंदी आ जाती है। यदि काम करने वालों को भरपूर पैसा दिया जाए तो वे उसे बाजार में खर्च करेंगे और उत्पादन खपता जाएगा। बेहतर मजदूरी ही मंदी को उत्पन्न ही नहीं होने देगी।
व्याख्याता बीएल सोनेकर
प. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
माक्र्स का घोषणा पत्र
पिछले साल जो विश्वव्यापी संकट अमेरिका से शुरू हुआ, उसकी कल्पना माक्र्स ने १६० साल पहले ही कर ली थी। वर्ष १८४८ में फ्रेडरिक एंजेल्स के साथ मिलकर उन्होंने जो कम्युनिस्ट घोषणापत्र तैयार किया था, उसमें खींची दुनिया की आर्थिक संकट की तस्वीर आज से काफी मिलती है।
घोषणा में कहा गया था कि आधुनिक बुर्जुआ समाज एक जादूगर की तरह है... उसने उत्पादन और विनिमय के इतने दैत्याकार साधन खड़े कर लिए हैं,..जिनकी वजह से मालिकों का मुनाफा दिन-रात बढ़ता जा रहा है और मजदूर लगातार गरीबी के गर्त में गिरते जा रहे हैं... आए दिन जो आर्थिक संकट पैदा होते रहते हैं, उनसे बुर्जुआ वर्ग के अस्तित्व और सत्ता को खतरा पैदा हो गया है... इन संकटों के दौरान अत्यधिक उत्पादन की ऐसी महामारी चारों तरफ फैलने लगती है,...अचानक समाज अपने आपको आर्थिक बर्बरता के बीच फंसा महसूस करने लगता है और ऐसा महसूस होने लगता है मानो किसी अकाल या सार्वभौमिक विनाशकारी युद्ध ने हमारे अस्तित्व के
लिए जरूरी समस्त साधनों को हमसे छीन लिया है। तब ऐसा लगता है जैसे सारे उद्योगों और व्यापार का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है... लेकिन ऐसा
होता क्यों है? इसका एकमात्र कारण यह है कि हम जीवन के असीम साधनों, उद्योगों और व्यापार को इतना अधिक बढ़ा देते हैं कि वह किसी राक्षस की
तरह हमें ही निगल जाने के लिए अपना मुंह खोलने लगता है। और इस प्रकार जिन चीजों का विस्तार बुर्जुआ समाज ने अपने आपको मजबूत बनाने के लिए किया था, वे ही उसकी दुश्मन बन जाती हैं।

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